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BhanuSinghal


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ध्य प्रदेश पंचायती राज का विकास क्रम पंचायती राज व्‍यवस्‍था भारतीय शासन व्‍यवस्‍था का अद्भुत अभिलक्षण है जो जन जन को शासन की गतिविधियों में सक्रिय सहभागी बनाए जाने लोकतंत्र की संकल्‍पना को अधिक यथार्थ में अस्तित्‍व प्रदान करने लोकतांत्रिक विकेंद्रीकरण लाने एवं स्‍थानीय समग्र विकास का महत्‍वपूर्ण अभियंत्र रहा है। अत: पंचायती राज वह माध्‍यम है जो शासन को सामान्‍य जन के दरवाजे पर लाती है। जिसमें शासन कार्यों में समाज के सभी वर्गों की भूमिका होती है। एवं स्‍थानीय समस्‍याओं का हल स्‍थानीय स्‍तर पर ही निकाला जाता है। इसी उद्देश्यो की पूर्ती के लिए अनेक उतार चढ़ावों से गुजरते हुए अंतत: 73वें संविधान संशोधन 1992 के द्वारा पंचायती राज संस्था‍ओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान कर देश में त्रिस्‍तरीय पंचायती राज की विधिवत स्‍थापना की गई। मध्‍यप्रदेश इस अधिनियम की अनुपालना करने वाला देश का प्रथम राज्‍य है। जिसने मध्‍यप्रदेश पंचायती राज एवं ग्राम स्‍वराज्‍य अधिनियम लागु कर विकेंद्रीकरण व्‍यवस्‍था के जरिए ग्राम वासियों को अपने विकास की दिशा तय करने का अवसर उपलब्‍ध कराया है। यद्यपि मध्य प्रदेश में स्‍वतंत्रता पूर्व पश्‍चात पंचायती राज व्‍यवस्‍था लागू थी परंतू 73वें संविधान संशोधन के बाद यह नए रूप में लागू हो पायी। मध्‍यप्रदेश के पुनर्गठन से पूर्व भी पंचायती राज व्‍यवस्‍था लागू थी। किन्‍तू यह व्‍यवस्‍था अलग-अलग क्षेत्रों एवं रियासतों में पृथक-पृथक थी। एवं यह उन क्षेत्रों के विधान के अनुसार वहां पर लागू थी। जैसे महाकौशल, विंध्य प्रदेश, मध्य भारत भोपाल में भिन्‍न-भिन्‍न प्रकार की पंचायती राज व्‍यवस्‍था कार्यरत थी। पंचायतों के कार्यों के संबंध में राज्‍य सरकार को शक्तियां- राज्‍य सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा पंचायतों को आर्थिक विकास समाजिक न्‍याय से संबंधित कोई कार्य सौंप सकती है। तथा पंचायतों के किसी भी कार्यों को वापस ले सकती है। निष्‍कर्षत: हम कह सकते हैं कि प्रदेश में पंचायतों का प्रभावी संगठनात्‍मक ढांचा बनाया गया है। तीनों स्‍तरों को पर्याप्‍त अधिकार सौंपे गए हैं। इसी कारण से राज्‍य सरकार केंद्र सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्न योजनाओं का बेहतर क्रियान्व‍यन संभव हुआ है। पंचायती राज संस्‍थाएं अब लोकतंत्र की प्रथम पाठशाला बन गयी हैं। पंचायती राज के माध्‍यम से योजना निर्माण में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हुई है एवं जनचेतना का विकाश सुनिश्चित हुआ है। कार्य विभाजन में कुछ प्रावधान ऐसे हैं जो ग्राम जनपद पंचायत को जिला पंचायत के आधीन करते हैं। इसमें तीनों स्‍तरों में कटुता उत्‍पन्‍न होती है। इसके अतिरिक्‍त संस्‍थाओं में भ्रष्‍टाचार संकीर्ण जातीय धार्मिक सोच नौकरशाही से समरसता पूर्ण संबंधों का आभाव वित्‍त की कमी आदि के कारण संस्‍थाओं की प्रभावशीलता घटती है। पंचायतों के बीते कार्यकालों की समीक्षा में यह पाया गया है कि ग्राम प्रचायतों में सरपंच की केंद्रीय भूमिका होती है। ग्रामसभा की भूमिका गौण हो जाती है। यह स्थिति ठीक नहीं है। इसलिए समय-समय पर पंचायती राज अधिनियम में संशोधन करके इन संस्‍थाओं को अधिक कारगर बनाने के प्रयास किए गए हैं ताकि ये संस्‍थाएं सच्चे प्रजातंत्र का आधार साबित हो सके।
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