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जब तक साँस तब तक आस।’ जब आशा ही नष्ट हो जाये, तो जीवन में रह ही क्या जाता है? सारा उत्साह ही ठंडा हो जाये, तो सब कुछ सूना, सब कुछ फीका, सब कुछ आनंदहीन हो जाता है।
कुछ लोग तो इतने कोमल और नाजुक होते हैं कि यदि उनका उत्साह टूट जाये तो वे अपने को वश में नही रख सकते। एक ही असफलता (Failure) उन्हें ले बैठती है। उसके बाद वे प्रयत्न करना ही बंद कर देते हैं। जिसका परिणाम यह होता है कि वे मध्यम कोटि के व्यक्ति रह जाते हैं, जबकि उनमें योग्यता उत्तम या प्रथम कोटि का मनुष्य बनने की थी।
उन्होंने ऊपर उठना जीवन की उंचाईयों पर चढ़ना बंद कर दिया, अतः वे नीचे ही रह गए। उन्होंने अपनी उन्नति को रोक दिया
पेड़ की शाखा पर बैठा पंछी कभी भी इसलिए नहीं डरता कि डाल हिल रही है, क्योंकि पंछी डाली में नहीं अपने पंखों पर भरोसा करता है।
आज हम आपको एक ऐसे ही व्यक्ति के जीवन की कहानी बताने जा रहे है, जिससे हमें काफी कुछ सीखने को मिलेगा, तो चलिए चलते हैं –
एक नवयुवक ने एक प्रख्यात विश्वविद्यालय से स्नातक की उपाधि प्राप्त कर ली। उसके बाद वह नौकरी खोजने लगा। कई महीने तक उसे नौकरी नही मिली। वह निराश हो गया। उसमे स्वाभिमान कूट-कूटकर भरा था। उसने विश्वविद्यालय की शिक्षा भी अपने प्रयत्नों से, अपने श्रम से धन जुटाकर पूरी की और अब उसके पास कुछ भी पूंजी शेष न थी।
पैसे समाप्त हो जाने के कारण उसे दो दिन से खाना भी नहीं मिल पाया था और किराया न दे पाने के कारण उसे निवास का कमरा भी छोड़ना पड़ा था। उसने कई रातें बाग की बेंच पर सोकर काटी। उसे यह अनुभव होने लगा कि उसके लिए धरती और आकाश सब उलट गए हैं। उसे अपना जीवन बेकार लगने लगा।
आत्मविश्वास वह संबल है, जो रास्ते की हर बाधा को धराशायी कर सकता है।
वह नौकरी के लिए जहाँ भी जाता, नौकरी न मिलती। अंत में निराश होकर उसने नौकरी ढूंढना ही छोड़ दिया। उसे लगा कि उसके भविष्य में प्रकाश की एक किरण भी बाकी नहीं बची। उसे इस भय ने जकड़ लिया कि वह निकम्मे और बेकार लोगों की श्रेणी में धकेल दिया गया है। उसके वस्त्र फटने आरम्भ हो गए।
ब उसकी ऐसी दशा हो गयी थी कि वह भले वेश में किसी के सम्मुख न जा सकता था। प्रथम तो कहीं जाने का उत्साह ही नहीं जुटा पाता, जो कहीं जाता भी तो उसे धिक्कारकर बाहर निकाल दिया जाता। अनेक प्रयत्नों से अंत में उसे एक रद्दी से होटल में बर्तन मांजने की नौकरी मिल गयी।
इससे उसकी रोटी तो जैसे-तैसे चलने लगी, लेकिन सोने के लिए अब भी उसे बाग में पड़ी बेंच का सहारा लेना पड़ता था।
एक रात वह इसी दुर्दशा में बेंच पर लेटा हुआ था कि अकस्मात् उसे एक नवीन दृष्टि प्राप्त हुयी। उसे आसमान में मोटे-मोटे अग्नि जैसे लाल अक्षरों में लिखा दिखाई दिया – ‘अपने पर विश्वास रखो
सारी रात वह सो नहीं सका। व्याकुलता से वह सुबह होने की प्रतिक्षा करने लगा। सुबह होते ही उसने अपने मन में वह बात पुनः दोहराई – ‘अपने पर विश्वास रखो वह उठा और नदी किनारे गया। वहां जाकर उसने हाथ-मुंह धोकर अच्छी तरह दाढ़ी बनायी।
सके बाद वह एक मोची के पास गया और मीठी बातें करके उसे अपना मित्र बना लिया। उसने बूट पॉलिश मांगकर अपने हाथों से अपने जूतों को चमकाया। तब मन में दृढ-संकल्प के साथ नौकरी की खोज करने लगा।
रात्रि को प्राप्त हुई चेतना और नवीन दृष्टि उसके लिए रक्षा-कवच के समान काम कर रही थी। अब वह किसी कार्यालय में जाता तो उसका स्वागत होता था। अब वह चोर नहीं लग रहा था। उसके वस्त्र विशेष अच्छे नहीं थे, पर उसके मुख पर आत्मविश्वास की झलक थी। वह जो कहता था, उससे भी आत्मविश्वास झलकता था। सौभाग्य से उसे नौकरी मिल गयी।
नौकरी उतनी अच्छी न थी, जितनी वह चाहता था या इच्छा करता था, लेकिन फिर भी काफी अच्छी थी। सबसे बड़ी बात यह थी की वह अपनी समस्या को सुलझाने में सफल हो गया था। उसने वह महान और महत्वपूर्ण पाठ पढ़ लिया था, जो अपने पर विश्वास करना सिखाता है, जो अपनी शक्तियों पर भरोसा करना सिखाता है।