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SURYAKANTPAVAIYA
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छात्रों में आज जो अराजकता दिखाई दे रही है, उसके लिए मुख्य रूप में छात्रों के अभिभावक, संरक्षक व शिक्षक उत्तरदायी होते हैं जो आजादी लेने के लिए हमने हड़ताल और भूख-हड़तालें की। इनका मनोवैज्ञानिक प्रभाव वर्तमान समाज पर स्पष्ट हैं। एक अन्य प्रमुख कारण हमारा राजनीतिक ढांचा भी है। हमने मतदान प्रणाली अपनाई है और एक व्यक्ति तब तक चुनाव नहीं जीत सकता जब तक उसे अपने आस-पास के लोगों का सहयोग और समर्थन प्राप्त न हो जाए। इसके लिए वह कई प्रकार से प्रयास करता है, पैसे खर्च करता है और अपना स्थान बनाना चाहता है। विद्यार्थी उनमें से है, जिसके कंधे पर बंदूक रखकर राजनीतिज्ञ अपना स्थान बनाना चाहता है। एक साधारण छात्र राजनीतिज्ञ की चालों से अक्सर अनभिज्ञ होता है और अपनी पढाई की कीमत पर मैदान में उतर जाता हैं यहीं से विद्यार्थी आव्हान पर कॉलेज में भूख हड़ताल या हड़ताल शुरु हो जाती है। जुलूसों और धुआंधार भाषण का सिलसिला शुरु हो जाता है और इन सब के बीच उसे हीरो बनने का अवसर मिल जाता है। वर्तमान राजनीतिक ढांचे की इस चर्चा से अभिप्राय यह नहीं कि उसे हम पढ़े लिखे तो है, गुने नहीं दूसरे शब्दों में हम साक्षर हैं शिक्षित नहीं हैं। इसलिये कर्तव्यों को पूरी तरह समझे बिना अधिकारों का नारा लगाते हैं और नारे बाजी में यह आस्था हमारे लिए मुसीबत बन गई है।