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विवेकानंद जी का मानना था कि, नैसर्गिक और स्वस्थ राष्ट्रवाद का विकास तभी होगा, जब न सिर्फ धर्मों के बीच, बल्की पूरब और पश्चिम की संस्कृतियों के बीच बराबरी का आदान-प्रदान हो। सिस्टर निवेदिता ने भी कई बार कहा है कि, जब स्वामी जी को खासतौर से हिंदू धर्म के अनुयायियों की बात करनी होती थी, तब वे ‘वैदिक या वेदांतिक’ शब्द का इस्तेमाल करते थे। सिस्टर निवेदिता ने अपनी किताब ‘नोट्स ऑफ सम वांडरिंग विद स्वामी विवेकानंद’ में उनको सांस्कृतिक संश्लेषक की उपाधी दी है। विवेकानंद जी अपनी मातृभूमि के उत्थान के लिये जिस राष्ट्रवाद की कल्पना करते हैं, उसके मूल में मानवतावाद, आध्यात्मिक विकास और सांस्कृतिक नवजागरण है। इसे हासिल करने के लिये उन्होने वेदांतिक दर्शन को अपना उपकरण बनाया। विवेकानंद जी जिस भूमिका को समझने की बात करते थे, वह नए मनुष्य और नए समाज की भूमिका थी। करुणा, व्यक्तिगत स्वतंत्रता, समानता और विश्वबंधुत्व पर आधारित आधुनिक शक्तिशाली भारत के निर्माण की भूमिका थी। स्वामी विवेकानंद एंड मॉडर्नाइजेशन ऑफ हिन्दुज़्म’ में हिलटुड रुस्टाव ने लिखा है कि, विवेकानंद एक ऐसा समाज चाहते थे, जहाँ बङे से बङा सत्य उद्घाटित हो सके और हर इंसान को देवत्व का अहसास हो। विवेकानंद सच को अपना देवता मानते थे और कहते थे कि पूरी दुनिया मेरा देश है। राष्ट्रवाद और राष्ट्रीयता उनके लिये किसी संकीर्णता का नाम नही था। विवेकानंद जी का मानना था कि, मुझे गर्व है कि मैं एक ऐसे धर्म से हूँ जिसने दुनिया को शहनशीलता और सार्वभौमिक स्वीकृति का पाठ पढाया है। हम सिर्फ सार्वभौमिक शहनशीलता में ही विश्वास नहीं रखते बल्कि हम विश्व के सभी धर्मों को सत्य के रूप में स्वीकार करते हैं।