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UmeshYadav4949


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्यारे केरजीवाल जी, मुझे लगा था दिल्ली एम सी डी चुनाव के बाद आपकी अकल ठिकाने गई होगी लेकिन आज जब आपके दल के नेता ने दिल्ली विधानसभा में इवीएम हैक करने का खेल दिखाया तो समझ में गया कि आपको अकल दांत भले जाये लेकिन आपको अकल कभी नहीं आएगी। चलो मान लेते हैं इवीएम हैक हो सकता है। जब मोहनी मंत्र फूँककर आदमी को भरमाया जा सकता है तो मशीन को भरमाना कोई बड़ी बात नहीं है। कुछ महीने पहले एक्सिस बैंक को कुछ मनचलो ने हैक कर लिया था। दुनियाँ की कई बेहतरीन और आधुनकी प्रणाली की तकनीक वाली कंपनियाँ पिछले कुछ साल में हैक हो चुकी हैं। इसलिए इवीएम हैक करना कोई बड़ी बात नहीं है। ऊपर बताए गए बैंक और हैक हुई कंपनियों में जो एक चीज सामान्य है, वह है उनका इंटरनेट से जुड़ा होना। इसलिए उन्हें एक जगह से बैठे बैठे तीन चार चतुर बुद्धि लोगों द्वारा हैक किया जा सकता है लेकिन आपको बताता चलूँ कि इवीएम ना तो इंटरनेट से जुड़ा होता है ना ही किसी सर्वर से तो उसे एक जगह बैठकर हैक करना असंभव है। यदि किसी प्रदेश का चुनाव जीतना है तो वहाँ की ५०% से अधिक मशीनों को हैक करना होगा। चूँकि इवीएम मशीन को एक जगह बैठकर हैक नहीं कर सकते हैं इसलिए सभी मशीनों में गड़बड़ी वाली चीप डालनी पड़ेगी और फिर उसे चुनाव के बाद निकलना पड़ेगा, ताकि आप जैसे लोगों के उंगली उठाने पर कोई जाँच हो तो सब सही मिले। अब इस कार्य को करने के लिए काफी लोग लगेंगे और उन काफी लोगों में से कोई ना कोई तो प्रशांत भूषण या फिर योगेंद्र यादव निकल ही आता। जो धांधले बाजी का ढोल सबके सामने फोड़ देता और आप से अच्छा इस बात को कौन जानता है। आप जैसे चतुर लिंगम बुद्धि के नेता और ऐसी चतुर लिंगम बुद्धि के चाटुकारों से घिरे रहनेवालों को इतनी आसान सी बात क्यों समझ में नहीं आती है। सुकमा में नक्सली हमले में शहीद हुए जवानों के परिजनों के मदद के लिए गौतम गंभीर अब सामने गये हैं. दरसल वे अपने मदद की बात सबसे छुपाना चाहते थे लेकीन आखिर ये बात सामने ही गयी. लेकिन मेरा ये आर्टिकल आज सिर्फ गौतम गंभीर पे नहीं बल्की उन लोगों पर ज्यादा है जो सिर्फ देश को तोड़ने वालों की बात करते हैं. कई टीवी चैनेल पर नक्सली विचारधाराओं के लोगों को टीवी डिबेट के नाम पर अपनी विचारधारा देश में फैलाने के लए बुलाते हैं. जंगल के नक्सली से ज्यादा खतरनाक तो शहर के ठंडे कमरे में बैठा नक्सली सबसे ज्यादा खतरनाक है. जंगल के नक्सली सिर्फ शरीर पे वार कर सकते हैं और उनके लिए हमारी सेना काफी हैं, लेकिन जो ए.सी. लगाकर ठंडे कमरों में बैठकर देश की विचारधारा को मार रहे हैं उनसे हमें खतरा ज्यादा है और ऐसे लोगों की तादाद आजकल बढने लगी हैं. इसे हमें रोकना ही होगा. जंगल वाले नक्सलियों से निपटने के लिए हमारे जवान हैं. पर जो शहर में रहने वाले हैं और टीवी पे आकर प्राईम टाईम में बैठ कर उनके लिए रोना रोते हैं, उनसे कौन निपटेगा? क्यूंकी जंगल के नक्सली सिर्फ शरीर पर हमला करते हैं लेकिन शहरो में रहने वाले ये सुट बूट के नक्सली बच्चों के दिमाग पे वार करते हैं. हाँ इससे जानमाल का नुकसान दिखता नहीं लेकिन वो बच्चे और जवान युनिव्हर्सिटी में ‘भारत तेरे टुकड़े होंगे’ नारा जरूर लगाते हैं. सरकार हमेशा की तरह खामोश इस बार भी सरकार ने इस नक्सली हमले की निंदा की है, और जवाब देने की बात कही है. लेकिन जवाब कब मिलेगा? पाकिस्तान पर सर्जिकल स्ट्राईक कर दी, लेकिन अब उस बात को महीने हो गये हैं, और बीजेपी आज भी वही ढोल पीट रही है जैसे काँग्रेस १९४७, १९६५ और १९७१ का ढोल पीटती है. मरनेवाले र्सिर्फ जवान नही होते हैं, उनके साथ मरते है उनके परिवारवाले, नई नवेली दुल्हन, बच्चों के सपने. टीवी वालों के पास दिखाने के लिए कन्हैया और रोहित वेमुला का परिवार है और पत्थरबाज को जीप पे बांधने के बाद उसके घर तक पहुंचने वाला मीडिया (१, को छोड़कर) कभी आर्मी के परिवार वालों के घर जवान के अंतिम संस्कार के १२ दिन बाद कभी नही पहुंचती है. झूठी पत्रकारिता कब तक? आजकल दिल्ली मे कई पत्रकार घूम रहे हैं. जो बड़ेबड़े कमरों में बैठते हैं और कहते हैं कि आर्मी तो सबपर जुल्म कर रही है. इनके लिए कन्हैया और खालिद जैसे लोग हीरो होते है लेकिन कभी जवानों के कुर्बानी पर एक आंसू नहीं बहाते. सबको पता है कौन सा न्यूज चैनेल नक्सली विचारधारा को समर्थन करता है और कौन सा नहीं. कुछ लोग टीवी डीबेट मे उन नक्सली विचारधाराओं के लोगों को फ्रीडम ऑफ एक्सप्रेशन ने नाम पर बुलाते है और उनकी विचारधारा पूरे देश मे फैलाना चाहते है. बहुत पहले मैंने एक उद्धरण पढ़ा था कि ‘जो समाज अपनी भाषा पर गर्व नहीं कर सकता उसका पतन निश्चित है।’ यह पतन सांस्कृतिक हो सकता है, नैतिक हो सकता है। आज जब हमारे पर्यावरण में हर प्रकार का प्रदूषण फैल रहा है तब हिंदी भाषा भी इससे अछूती नहीं है, अंतर सिर्फ यह है कि हिंदी भाषा मे बढ़ता प्रदूषण हिंदी के अंग्रेजीकरण का है। यह बात मैं आज आकस्मिक ही नहीं कह रहा हूँ अपितु अपने पिछले कई वर्षों के अनुभव पर कह रहा हूँ। हम सब रोजाना हिंदी के विकृत रूप से दो चार होते हैं परन्तु हम सब ने इसे बहुत सामान्य रुप से देखना शुरु कर दिया हैं। आज चाहे वह समाचार पत्रिकाएं हो या फिर हिंदी समाचार चैनल या अन्य कोई हिंदी धारावाहिक, हम रोजाना हिंदी भाषा के चीरहरण को देखते हैं। ऐसे जाने कितनी बार हम हिंदी भाषा का मजाक बनते हुए देखते हैं परन्तु हमारे लिए यह सब अब ‘नार्मल’ हो चला है। पर हम सब के लिए अपवाद की स्थिति तब होती है जब कोई अंग्रेजी मे हिंदी का मिश्रण करता है। भाषा में बढ़ते प्रदूषण के लिए मीडिया से ज्यादा हम एक समाज के तौर जिम्मेदार हैं। हमारा समाज अपनी भाषा के अंग्रेजीकरण के प्रति
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