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SanjayKushwaha8677
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पंचायती राज व्यवस्था भारतीय शासन व्यवस्था का अद्भुत अभिलक्षण है, जो जन-जन को शासन की गतिविधियों में सक्रिय सहभागी बनाये जाने लोकतंत्र की संकल्पना को अधिक यथार्थ में अस्तित्व प्रदान करने, लोकतांत्रिक विकेन्द्रीकरण लाने एवं स्थानीय समग्र विकास का महत्वपूर्ण अभियंत्र रहा है। अत: पंचायतीराज वह माध्यम है, जो शासन को सामान्यजन के दरवाजे पर लाती है, जिसमें शासन कार्यों में समाज के सभी वर्गों की भूमिका होती है। इसी एवं स्थानीय समस्याओं का हल स्थानीय स्तर पर ही निकाला जाता है। इसी उद्देश्य की पूर्तिं के लिए अनेक उतार-चढ़ावों से गुजरते हुए अन्तत: 73 वे संविधान संशोधन-1992 के द्वारा पंचायती राज संस्थाओं को संवैधानिक दर्जा प्रदान कर देश में त्रिस्ततरीय पंचायती राज की विधिवत् स्थापना की गयी है। म.प्र. इस अधिनियम की अनुपालना करने वाला देश का प्रथम राज्य है। जिसने म.प्र. पंचायती राज एवं ग्राम स्वेराज अधिनियम लागू कर विकेन्द्रीकरण व्यवस्था के जरिए ग्रामवासियों को अपने विकास की दिशा तय करने का अवसर उपलब्ध कराया है। यद्यपि म.प्र. में स्वतंत्रता पूर्व व पश्चात् पंचायतीराज व्यशवस्था लागू थी, परन्तु 73 वें संविधान संशोधन के बाद यह नये रूप में लागू हो पायी। म.प्र. के पुनर्गठन से पूर्व भी पंचायती राज व्यवस्था लागू थी, किन्तु यह व्यवस्था अलग-अलग क्षेत्रों एवं रियासतों में पृथक-पृथक थी एवं यह उन क्षेत्रों के विधान के अनुसार वहाँ पर लागू थी। जैसे- महाकौशल, विंध्यप्रदेश, मध्यभारत, भोपाल, में भिन्न-भिन्न प्रकार की पंचायतीराज व्य्वस्थान कार्यरत् थी। राज्यश सरकार साधारण या विशेष आदेश द्वारा पंचायतों को आर्थिक विकास व सामाजिक न्याय से सम्बन्धित, कोई कार्य सौप सकती है तथा पंचायतों के किसी भी कार्यों को वापस ले सकती है। निष्कर्षत: हम कह सकते हैं, कि प्रदेश में पंचायतों का प्रभावी संगठनात्मक ढाँचा बनाया गया है। तीनों स्तरों को पर्याप्त अधिकार सौंपे गये है। इसी कारण राज्य सरकार व केन्द्र सरकार द्वारा चलाई जा रही विभिन्नो योजनाओं का बेहतर क्रियान्वयन सम्भव हुआ है। पंचायती राज संस्थायें अब लोकतंत्र की प्रथम पाठशाला बन गई है। पंचायती राज के माध्यम से योजना निर्माण में लोगों की भागीदारी सुनिश्चित हुई है एवं जनचेतना का विकास सुनिश्चित हुआ है। कार्य विभाजन में कुछ प्रावधान ऐसे हैं।