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UmeshYadav4949
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शीलयुक्तन व्यनवहार मनुष्यन की प्रकृति और व्य क्तित्वा को उदघ्टित करता है। उत्तम, प्रशंसनीय और पवित्र आचरण ही शील है। शीलयुक्त व्य्वहार प्रत्येक व्यनक्ति के लिए हितकर हैा इससे हृदय जीत लेता है। शीलयुक्त व्यृवहार से कटुता दूर भागती है । इससे शंका और संदेह की स्थितिया कमी उत्प न्न् नही होता इससे ऐसा सुखद वातावरण सृजित होता है। जिसमें सभी प्रसन्ता्यृ का अनुभव करते है । शीलवान व्याक्ति अपने संपर्क में आने वाले सभी लोगों को सुप्रभावित करता है। शील इतना प्रभुत्वपूर्ण होता है कि किसी कार्य के बिगड़ने की नौबत नहीं आती । अधिकारी-अधीन , शिक्षक-शिक्षर्थी, छोटे- बडों आदि सभी के लिए शीलयूक्तद व्यलवहार समान रूप से आवश्यक है। शिक्षार्थी में शील का अभाव है तो वह अपने व्य।वहार समान रूप से आवश्यक है । श्क्षिार्थी में शील का अभाव है तो वह अपने श्क्षिक से वांछित शिक्षा प्राप्त् नहीं कर सकता । शीलवान अधिकारी या कर्मचारी में आत्मसविश्वा स की वृद्धि स्वरत: ही होने लगती है और साथ ही साथ उसके व्यिक्तित्वस में शालीनता आ जाती है। इस अमुल्य गुण की उपस्थिति में अधिकारी वर्ग और प्रत्येसक वर्ग की कार्यकुशलता में वृद्धि होजी है। इस गुण के माध्यतम से छोटे से छोटा व्यक्ति बड़ो की सहानुभुति अर्जित कर लेता है । शील कोई दुर्लभ और गुण नहीं है। इस गुणों को अर्जित किया जा सकता है । पारिवारिक सस्का र इस गुण को विकसित और विस्तिरित करने में बडी भूमिका अदा करते है ।मूल भुमिका तो व्यसक्ति स्वंयय अदा करता है। चितंन , मनन, सत्संूगति, स्वा ध्यालय और सतत अभ्या्स से इस गुण की रक्षा सुरक्षा और इसका विकास होता है। सुसंस्कृत मनुष्यई के चरित्र का यह शील अभिन्ने अंग है। यह गुण मनुष्या को सच्चे अथो मे मानव बनाता है । इस अमुल्य गुण को अपने जीवन का अभ्निन अंग बनाना प्रत्येसक मनुष्य् का परम कर्तव्यं है। इससे मनुष्य की गरिमा बढ़ती है और उससे व्येक्तित्व में चार चांद लग जाते है।