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RUCHIRTAMRAKAR
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वर्ष 1994 की सर्दियों में जब में मुंबइ्र से दिल्लीन चला गया था तो संसद को कवर करने का बड़ा आकर्षण था। महात्मा गांधी और आम्बे डकर की प्रतिमाओं के पास से गुजरना बहुत प्रेरणादायक था, सेंट्रल हॉल में जाकर देश के संस्थामपाकों के पोर्ट्रेट निहारना, अद्भुत अनुभव रहा। जब मैंने पहली बार उॅर्जा से भरे जॉर्ज फर्नाडीस को संसद के गलियारों में तेजी से जाते देखा था तो उत्तेरजित हो गया था। अटल बिहारी वाजपेयी को तेजस्वीे भाषण देते देखा तो मैं रोमांचित हो गया। सोमनाथ चटर्जी अपनी भारी-भरकम काया के साथ बोलने के लिए खडे हए तो मैं उत्साोहित था। यह भारतीय लोकतंत्र का वह मंदिर है, जहां सारे धर्मो और राजनीति विचारधाओं के लोगों को बिना भेदभाव के समायोजित कर लेते है। लगभग 25 साल बाद मुझे यह लिखे हुए दुख होता है कि संसद को लेकर किसी ने जो भी रूमानी ख्याकल बुन लिए थे वे ध्विस्त हेा चुके है। ससंद का शीतकालीन सत्र गुजरात चुनव होने तक टालने का मतलब है कि एक राज्यन के चुनाव का ‘राष्ट्री य’ संसद से अधिक महत्वच है, (नया कार्यक्रम क्रिसमस के बीच डाल दिया गया है, जो कैथेलिक सांसदों के लिए असुविधानजक होगा लेकिन, उनकी संख्याच इतनी कम है कि शायद निर्णयकताओं के लिए उनका कोई महत्वा नही है)। शीतकालीन सत्र आगे बढ़ाने के पीछे सरकार की दलीले मौजूदा वास्तकविकताओं और भूतकाल के अनुभव पर आधारित है। कहा गया कि प्रधानमंत्री के गृह राज्यल गुजरात में इतना कुछ दांव पर लग गया है कि कि हर प्रमुख राजनेता गुजरात के अभियान में लगा है और संसद के लिए उनके पास वक्तह नहीं है। यह भी ध्याेन दिलाया गया कि भूतकाल में भी ऐसा हुआ है खासतौर पर 2013 में जब यूपीए सरकार ने विधानसभा चुनावों के कारण शीतकालीन सत्र छोटा कर दिया था। ये दलीलें यकीन दिलाती हैं लेकिन, विचलित करने वाले चलन की ओर इशारा करती हैं, जिसमें चुनावी गहमागहमी को विधयेक पारित करने की नीरस कवायद से अधिक महत्वी दिया जा रहा हे। कम से कम यूपीए सरकार में तो डॉ. मनमोहन सिंह से वोट मांगते हुए देशभर में घूमते-फिरने की अपेक्षा नहीं थी। यही उनकी कमजोरी थी पर एक अर्थ में वह उनकी सरकार को चुनावों के सतत दवाब से सुरक्षित रखती थी। इसके विपरीत नरेंद्र मोदी चौबीसों-घंटै सातों दिन चुनावी अभियान चलाने वाले नेता हैं, ऐसे व्य क्ति जो चुनावी राजनीति के अखाड़े का पूरा लुत्फं उठाते हैा। सत्तानरूढ् भाजपा के लिए स्टाथर प्रारक के रूप में प्रधानमंत्री के अत्यंजत व्य स्तफ कार्यक्रम का मतलब यह है कि लगभग हर चुनाव ही प्रधानमंत्री पर छोटा-मोटा जनमतसंग्रह है। नतीजा यह है कि चुनावी सफलता सरकार के लिए प्रेरक शक्ति बन गई है, वह ऑक्सीहजन जो मोदी का महारथ चलाए रखती हे है। तथ्यक तो यह है कि संसद के प्रति यह लापरवाह रवैया गुजरात में मोदी के मुख्यहमंत्री कार्यकल में ले जाता है।, जहां गांधीनगर में विधानसभा के सत्र प्राय: सभी कवायद होते थे। उन 12 वर्षो में विधानसभा के सत्र में लगभग नियमित कटौती की जाती थी और विपक्षी विधायकों को कई बार ‘उपद्रवी’ व्येवहार के कारण थोक में निलंबित कर दिया जाता था। मोदी सरकार प्रश्नो काल में आते और महत्वरपूर्ण बहसों में बहुत कम हिस लेते। यह मोदी के कामकाज की खास शैली थी एक ऐसे नेता जिनका शासन विधायिका से मंजूरी में देी को बाधा की तरह देखता था और जिसने विधानसभा में अपने जबर्दस्तक बहुमत का उपयोग विपक्षियों के साथ व्यसवहार की शर्ते तय करने में किया। विंडबना है कि 2014 में प्रधानमंत्री के रूप मोदी ने दहलीज पर माथा टेककर संसद में पहली बार प्रवेश किा था और लोकतंत्र के ‘मंदिर’ के लिए अपनी श्रद्धा व्रूसक्त की थी। इस साल जुलाई में उन्हों ने वस्तुग एवं सेवा कर (जीएसटी) लागू करने के लिए ‘फ्रीडम एट मिडनाइट’ का अपना संस्कुरण आयोजित किया तो फिर वहीं भावनाएं जाहिर कीं। अब संसद में महत्व पूर्ण बहस के दौरान प्रधानमंत्री की बार-बार अनुपस्थिति देखकर पिक्ष कहने लगा है कि वाजपेयी के विपरीत मोदी के पास ससंदीय बहस के लिए ज्यासदा वक्तष नहीं है। मोदी की रूल-बुक में संसद में, खासतैर पर राज्यासभा में जहां हाल तक संख्याथबल भाजपा के पक्ष में नहीं था, गरमागरम सवाल-जवाब में विरोधियों से उलझने की बजाय एकतरफा ‘मन की बात’ में सीधे मतदाता से बात करना अधिक आसान है। ऐसा भी नहीं है कि संसदीय कामकाज में विपक्ष को कोई विश्वेसनीय रिकॉर्ड हो। मई 2014 में संसद में कांग्रेस का नेता बनने से राहुत गांधी का इनकार शायद सार्वजनिक रूप से बोलने के कौशल को लेकर आत्म विश्वांस का अभाव दर्शाता था। मोदी सरकार के पहले तीन वर्षो में उनकी उपस्थिति 54 फीसदी ही रही। औसत सांसद से बहुत कम, जो 80 फीसदी बैठकों में भाग लेते हैं। 2017 के मानसून सत्र के पहले राहुल ने तीन वर्षो में सिर्फ 11 बहसों में भाग लिया। यह ऐसा रिकॉर्ड है जो उस विपक्ष में उत्सा्ह नहीं भर सकता, जो अब भी 2014 की चुनावी पराजय से उबरा नहीं है। लेकिन, संसद का संकट इसके प्रमुख खिलाडि़यों से आगे भी है। सच तो यह है कि कई सांसद संसद में प्रभावी ढंग से बोलने की काबिलियत बजाय अन्यह बातों को ध्यासन में रखकर चुने कए हैं। चुनाव के ‘अत्यंकत स्थांनीय’ होने से जीतने की संभावना वक्तृकत्वा कौशल की बजाय स्थानीय संपर्क से अधिक प्रभवित होती है। एक वक्त्प था कि सांसदों को उनके आंदोलित करने वाले भाषणों के कारण सराहा जाता था, अब हंगामा करने की ताकत तत्का ल ध्यावन आकर्षित करती है। लेकिन, बार-बार कार्यवाही स्थ गित होना यानी लोगों की निगाह में संसद की वैधता क्रमश: पतन होते जाना हैं। यहीं वजह है कि सरकार शीतकालीन सत्र आगे बढ़ाकर भी आलोचना से बच जाएगी। वैसे भी जब सर्वशक्तिमान एग्जीकक्यू टिव हर फैसला ले रहा है तो अनुशासनहीन सांसदों का दुखदयी दखल किसे चाहिए।