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VishnuBarua


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महिला एक साधु केे पास जाकर बोली - बाबा, मेरा बेटा गुड़ बहुत खाता है, इस कारण यह अस्‍वस्‍थ रहता है. निवेदन है कि आप इसका समझाकर इसकी यह आदत छुड़ा दें. साधु ने कहा एक सप्‍ताह बाद आना. महिला अपने पुत्र केे साथ एक सप्‍ताह बाद पहुँची. साध ने फिर कह दिया एक सप्‍ताह बाद आना. इस प्रकार चार सप्‍ताह बीत गए. पॉंचवी बार जब माता-पुत्र पहुँचे, तो साधु ने पुत्र से पूछा-तुम इतना गुड क्‍यों खाते हो ? गुड़ खाना छोड़ दो, पुत्र ने अगले दिन से गुड़ खाना बन्‍द कर दिया. माता ने जाकर साधु के प्रति हार्दिक कृतज्ञता व्‍यक्‍त की और प्रश्‍न किया - बाबा इस बात को कहने के लिए आपने पॉंच सप्‍ताह का समय क्‍यों लिया ? बाबा ने हँसकर उत्तर दिया - मैं स्‍वयं गुड़ खाया करता था. जब तक मैं स्‍वयं गुड़ खाना छोड़ दे. पॉंच सप्‍ताह में मैने गुड़़ खाना छोड दिया था. इस कारण मेरे कथन ने बालक को प्रभावित किया और उसका वांछित परिणाम सामने गया। हम स्‍वयं देख सकते है कि हमारे नेताओं द्वारा नित्‍य उपदेशात्‍मक बडे-बडे व्‍याख्‍यान दिए जाते हैं, परन्‍तु उनका कोई प्रभाव नहीं पड़ता है, क्‍याेंकि वक्‍ता की वाणी के पीछे नैतिक बल नहीं होता है इसकेे विपरीत ये ही बातें जब महात्‍मा गांधी कहते थे, तो हजारों व्‍यक्ति उनकी बात मानकर सर्वस्‍व बलिदान करने को तैयार हो जाया करते थे महात्‍मा जी वही कहते थे, जो वह करते थे और वही करते थे जो वह कहते थे। कथनानुसार कार्य करने से व्‍यक्ति की वाणी में जिस आत्‍मबल की सृष्टि होती है, उसके द्वारा वाणी में बल एवं प्रभावशीलता का समावेश हो जाता हैं जो लोग अच्‍छी-अच्‍छी बातें करते हैं और तदानुसार आचरण नहीं करते हैं उनके कथन की अपेक्षा लोग यह कहकर कर दिया करते हैं - “आप मियॉं फजी़हत, दीगँरा नसीहत”। कथनी और करनी के मध्‍य सामंजस्‍य का अभाव संकल्‍प शक्ति को दुर्बल बना देता है, फलत: व्‍यक्ति के नैतिक बल एवं आत्‍मविश्‍वास का क्षरण होता है और वह केवल वाक्सूर बनकर रह जाता है ऐसे व्‍यक्ति सेमल के फूल की भाँति आकर्षक तो हो सकते हैं। परन्‍तु चे सर्वथा सारहीन होते हैं। वे समाज के किसी काम के नहीं होते। धन्‍यवाद सतेंन्‍द्र कम्‍प्‍यूटर टाइपिंग बजरिया भिण्‍ड मोबाईल नं. 9893251479
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