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PankajKashyapSharpmi
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वित्तीय समावेशन एक ऐसा मार्ग है जिस पर सरकारें आम आदमी को अर्थव्यवस्था के औपचारिक माध्यम में सम्मिलित करने का प्रयास करती है ताकि यह सुनिश्चित किया जा सके कि अंतिम छोर पर खड़ा व्यक्ति भी आर्थिक विकास के लाभों सेवंचित न रहे तथा उसे अर्थव्यवस्था की मुख्यधारा में शामिल किया जाए और ऐसा करके गरीब आदमी को बचत करने, विभिन्न वित्तीय उत्पादों मे सुरक्षित निवेश करने के लिए प्रोत्साहित किया जाता है तथा उधार लेने की आवश्यकता पढ़ने पर वब उन्ही औपचारिक मादअयमों सेउधार भी ले सकता है। वित्तीय समावेशन का अभाव होना साज एवं व्यक्ति दोनों के लिए हनिकारक है। जहां तक व्यक्ति का संबंध है, वित्तीय समावेशन के अभाव में, बैंकों की सुविधा से वचित लोग अनौपचारिक बैंकिंग क्षेत्र से जुड़ने के लिए बाध्य हो जाते हैं, जहां ब्याज दरें अधिक होती है और प्राप्त होने वाली राशि काभी कम होती है। चूंकि अनौपचारिक बैंकिग ढांचा कानून की परिधि से बाहर है, अत: उधार देने वालों और उधार लेने वालों के बीच उत्पन्न किसी भी विवाद का कानूनन निपटान नहीं किया जा सकता। जहां तक सामाजिक लाभों का संबंध है। वित्तीय समावेशन के फलस्वरूप उपलब्ध बचत राशि में वृद्धि होती है, वित्तीय मध्यस्थता की दक्षता में वृद्धि होती है, तथा नए व्यावसायिक अवसर प्राप्त करने की सुविधा प्राप्त होती है। इस परिस्थितिकी में सरकार द्वारा प्रायोजित सर्वसुलभ बैंकिग प्रणाली के कारण अधिक प्रतिस्पर्धी बैंकिग परिवेश की तुलना में ग्रामीण क्षेत्रों मे अधिक आर्थि विविधीकरण में योगदान प्राप्त हुआ है। 1980 और 1990 के दशकों में आरम्भ किए गए ढांचागत समायोजन कार्यक्रमों से वित्तीय बाजार के सुधार के लाभ अनेक विकासशील देशों में पहुंचे। 20वीं शताब्दी के आरंभ में भारत में बीमा कंपनियों (जो जीवन बीमा और साधारण बीमा योजनाएं चलाती थीं) और एक कार्यशील स्टॉक एक्सचेंज काम कर रहा था। वित्तीय समावेशन का कार्यक्षेत्र केवल बैंकिग सेवाओं तक ही सीमित नहीं है।