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AKHILESHYADAV1479496
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रामप्रसाद बिस्मल के दादा जी मूल रुप से ग्वालियर राज्य से थे। इनका पैतृक क्षेत्र ब्रिटिश शासनकाल में चम्बल नदी के किनारे तोमरगार प्रान्त के नाम से जाना जाता था। इस प्रदेश के निवासी निर्भीक, साहसी और अंग्रेजों से सीधे रुप से चुनौती देने वाले थे। यहाँ लोगों का जब मन करता वो अपनी बन्दूकें लेकर नदी पार करके उस क्षेत्र के ब्रिटिश अधिकारियों को धमकी देकर वापस अपने गाँव लौट आते। इस प्रान्त के जमींदारों का ये हाल ता कि वो अपनी मनमर्जी से माल गुजारी (लगान) देते थे। मन न होने की स्थिति में वो अपना सारा सामान लेकर चम्बल के बीहड़ों में छुप जाते थे और लगान नहीं देते थे।रामप्रसाद में भी यहीं का पैतृक खून ता जिसका प्रमाण उन्होंने अंग्रेजों के खिलाफ क्रान्तिकारी गतिविधियों को कार्यान्वित करके दिया। बिस्मिल के दादाजी नारायणलाला को पारिवारिक झगड़ों के कारण अपना गाँव छोड़ना पड़ा। नारायण लाल अपने दोनों पुत्रों मुरलीधर (बिस्मिल के पिता) और कल्याणमल को लेकर शाहजहाँपुर आ गये और यहीं रहने लगे। इनके दादाजी ने शाहजहाँपुर औकर एक दवा बेचने वाले की दुकान पर 3 रुपयेय- महीने की नौकरी की। नारायण लाल के यहाँ आने के समय इस क्षेत्र में भीषण अकाल पड़ रहा था।ख ऐसे समय में इनकी दादी ने बड़ी कुशलता के साथ अपनी गृहस्थी को संभाला। कुछ समय बाद ही इनकी दादी ने आर्थिक तंगी को दूर करने के लिये 3-4 घरों में जाकर पिसाई का काम करना शुरु कर दिया और काम से वापस आकर अपने बच्चों के लिए खाना बनाती थी। इन्होंने इतने कठिन समय में बहुत साहस के साथ अपने पति व दोनों बच्चों का पालन-पोषण किया। इनके परिवार ने मुसीबतों का सामना करके अनेक कष्टों के बाद स्वंय को स्थापित करके समाज में अपनी प्रतिष्ठित जगह बनायी। इनके दादाजी ने कुछ समय बाद नौकरी छोंड़कर पैसे, दुअन्नी, चवन्नी आदि बेचने की दुकान शुुुरु कर दी जिससे अच्छी आमदनी होन लगी। नारायणलाल ने अपने बड़े बेटे को थोड़ी बहुत शिक्षा दिला दी और जी-जान से महनत करके एक मकान भी खरीद लिया। बिस्मिल के पिता, मुरलीधर के विवाह योग्य होनो पर इनकी दादी ने अपने मायके में इनका विवाह करा दिया। मुरलीधर अपने परिवार के साथ कुछ समय अपने ननिहाल में रहने के बाद अपने परिवार और पत्नि को विदा करा कर शाहजहाँपुर आ गये। रामप्रसाद के जन्म के समय तक इनका परिवार पूरी तरह से समाज में एक प्रतिष्ठित व सम्पन्न परिवारों में गिना जाने लगा धा इनके पिता ने विवाह के बाद नगर बालिका में 15य़ महीने की नौकरी कर ली और जब वो इस नौकरी से ऊब गये तो इन्होंने वो नौकरी छोड़कर कचहरी में सरकारी स्टाॅम्प बेचने का कार्य शुरू कर दिया। इनके पिता मुरलीधर सच्चे दिल के और स्वभाव से ईमानदार थे। इनके सरल स्वभाव के कारण समाज में इनकी प्रतिष्ठा स्वंय ही बढ़ गयी।रामप्रसाद बिस्मिल के बाद इनकी माता ने 5 बेटियों और 3 बेटों को भी जन्म दिया। इनके कुल की एक प्रथा थी कि परिवार में बेटियों के जन्म होतो ही उन्हें मार दिया जाता था। इनकी बहनों के जन्म के बाद इनकी दादी ने कुल की प्रथा का निर्वहन करते हुये लड़कियों को मार देने के लिये कहा