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मारा संविधान हमें स्‍वतंत्रता का अधिकार देता है। परंतु जब मृत्‍युशय्या पर पड़े व्‍यक्ति को स्‍वास्‍थ्‍य सेवा या उपचार देने की बात आती है तब हमारा स्‍वतंत्रता का अधिकार एक किनारे कर दिया जाता है। कोई भी चिकित्‍सक व्‍यक्ति की उपचार लेने की इच्‍छा या अनिच्‍छा का आदर करते हुए उसे कष्‍ट दायक कभी-कभी तो व्‍यर्थ की उपचार प्रक्रिया में झोंक देने से परहेज नहीं करता। दरअसल, हमारे स्‍वास्‍थ्‍य तंत्र में किसी मरीज की इच्‍छा से उसे शांतिपूर्वक प्राकृतिक मृत्‍यु प्रदान करने जैसा प्रावधान ही नहीं है। चिकित्‍सकों के दिमाग में यही भरा हुआ है कि उन्‍हें हर हालत में मरीज की जान बचानी है। उन्‍हें किसी अन्‍य विकल्‍प को साथ लेकर चलने का प्रशिक्षण ही नहीं दिया जाता। प्रशिक्षण की ऐसी कमी चिकित्‍सा विभाग के चिकित्‍सकों, नर्सों परामर्शदाताओं में सभी में देखी जा सकती है। हमारे देश में बहुत कम अस्‍पताल ऐसे हैं, जो सख्‍ती स्‍वास्‍थ्‍य सेवाऐं प्रदान करते हैं। तकनीक का उपयोग नि:संदेह अच्‍छा है एवं लाभदायक भी है। लेकिन जब किसी मरीज की जीवन रक्षा में महँगी तकनीक भी विफल हो जाती है, तो जनता का अस्‍पतालों की लूट खसोट की नीति पर चला जाता है। विदेशों में स्थिति भिन्‍न है। खासतौर पर पश्चिमी देशों में जब 1960 के दौरान आईसीयू की शुरुआत हुई, तो लोगों में उम्‍मीद जगी। वे मानने लगे कि डॉक्‍टर ही सबसे अच्‍छा निर्णय ले सकता है। इसके पीछे मरीजों के ठीक होने की दर काम कर रही थी। इथोनेशिया की बात सबसे पहले अमेरिका में की गई। इसमें मरीज को अपने जीवन को समाप्‍त करने के लिए अतिरिक्‍त चिकित्‍सा सेवाओं से इन्‍कार करने का अधिकार दिया गया। सन् 1991 में अमेरिकी कांग्रेस ने इससे संबंधित '' सेल्‍फ डिटरमिनेशन विधेयक '' पारित कर दिया। इसके अन्‍तर्गत मरीज को इच्‍छामृत्‍यु इथोनेशिया से संबंधित एड़वांस साथ-साथ हेल्‍थ केयर पावर ऑफ अटार्नी का अधिकार दे दिया। पावर ऑफ अटार्नी के द्वारा मरीज के किसी रिश्‍तेदार या निकटतम व्‍यक्ति को उसके जीवन रक्षक उपकरण हटाने का निर्देश देने का अधिकार मिल गया। कई देशों में लाइफ केयर यानि ईओएलसी का चलन है। जैसे ही मरीज को प्राणघातक बीमारी का खतरा बताया जाता है या उम्र के कारण मृत्‍यु की संभावनाएं व्‍यक्‍त की जाती हैं, उसी समय मरीज के परिजनों एवं मरीज से जीवन रक्षक उपकरणों के उपयोग पर परामर्श प्रारंभ कर दिया जाता है। तत्‍पश्‍चात उन्‍हें स्‍वाभाविक मृत्‍यु तक अवसाद, पीड़ा आदि से निपटने में सहायता दी जाती है। ऐसी कोशिश की जाती है कि मरीज की मृत्‍यु शांतिपूर्वक वातावरण चाहे अस्‍पताल या घर में हो। ऐसा तब संभव होने के लिए मरीज की लिविंग विल या जीवन की इच्‍छा या अनिच्‍छा का प्रमाण पत्र भी आधार होता है। भारत में भी ऐसे इसी आधार की जरूरत है।
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