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Lokendarasingh


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लती सभी से होती है। एक वर्ग होता है जो गलती हो जाने पर क्षमा मांग लेता है। दूसरा एक वर्ग जिद पर अड़ जाता है कि मेरी गलती है ही नहीं। तीसरा वर्ग गलती हो जाने के बाद सावधान हो जाता है कि दोबारा ऐसा हो जाए। लेकिन सारा ताना-बाना इस तरह से बुनता है कि साबित कर सके जो मैंने किया या कर रहा हूं वह गलत है ही नहीं। ऐसे लोगों की तर्कशक्ति, वाणी का प्रभाव, निर्णय क्षमता गलती पर ऐसा आवरण ओढ़ा देती है कि सामान्य लोग समझ ही नहीं पाते कि इन्होंने कोई गलती की है अपनी गलती उजागर हो और दूसरे की पकड़कर शोर मचाने में मनुष्य बड़ा माहिर होता है। हमारे यहां साधुओं के लक्षण में एक यह भी बाताया गया है कि साधु अपनी गलती को बहुत अच्छे से गहराई में जाकर पकड़ लेते हैं। इसीलिए लिखा है कि साधु वह जो पानी में भी चले और पैर भी भीगें। साधु सक्षम होता है गलत करने की स्थितियों में भी अपने आपको को बचा सके। दुर्गुणों के लगातार आक्रमण से बच जाएं, कोई गलती नहीं करें तो साधु। दूसरों को पता चले तो कोई बात नहीं पर जब स्वयं इस स्थिति से गुजरेगें तो व्यक्तित्व का बड़ा नुकसान कर लेंगे। गलती करके हम दूसरों को ही नहीं, स्वयं को भी हानि पहुंचा रहे होते हैं। इसलिए पहली बात तो गलती करें नहीं और हो भी जाए तो दोबारा हो ऐसा संकल्प जरूर लेना चाहिए।
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