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sunilsingh786865738
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पीडि़त लोगों के कष्टों का दुष्प्रभाव स्पष्टत: संपूर्ण समाज पर पडता है । समाज के चार सम्पन्न लोगों को पास-पडोस में यदि कष्टों से रोते-बिलखते लोग दिखाई देंगे, तो उनके मन-मस्तिष्क पर भ्ाी बुरा प्रभाव पड़ेगा । चाहे उनके मन में पीडित लोंगो की सहायता करने की भावना उत्पन्न न हो , परन्तु लाेगो के दुखों से उनका मन अशान्त अवश्य होगा। किसी भी समाज में व्यापत रोग अथवा कष्ट का दुष्प्रभाव समाज के सम्पूर्ण वातावरण को दूषित करता है । और समाज के हित में ही अपना हित दृष्टिगोचर होता है। मनुष्य की विवशता है कि वह अकेला जीवन व्यतीत नहीं कर सकता है । जीवन-पथ पर प्रत्येक व्यक्ति को लोगों की अावशयकता पड़ती है। एक-दूसरे के सहयोग से ही मनुष्य उन्नति कर सकता है । परंतु स्वार्थी प्रवृत्ति के लोग केवल अपने हित की ही चिन्ता करते हैं।उनके हृदय में सम्पूर्ण समाज के उत्थान की भ्ाावना उत्पन्न नहीं होती है ऐसे व्यक्ति समाज की सेवा के अयोग्य होते हैं । समाज में उनका कोई योगदान नहीं होता । समाज सेवा के लिए त्याग एवं परोपकार की भावना का होना अावश्यक है।