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पाकिस्तान की आंतरिक राजनीति और उसके भू-राजनीतिक समीकरणों ने जमात उद दावा के प्रमुख हाफिज सईद को जो हैसियत दी है उसे महज बयानबाजी से रोकना संभव नहीं। इसी राजनीति का प्रभाव है कि वह अपने को आतंकी के दाग से बरी कराने के लिए संयुक्त राष्ट्र के दरवाजे तक पहुंच गया है। सईद ने रिहाई के बाद जब कश्मीर के लिए गोलबंदी का दावा किया तो भारत ने मुंबई हमले के लिए उसे जिम्मेदार बताते हुए विरोध किया और अमेरिकी विदेश विभाग ने भी उसे सैकड़ों बेगुनाहों की हत्या के लिए उत्तरदायी कहते हुए गिरफ्तार किए जाने की मांग की। इसके बावजूद अगर पाकिस्तान अपनी अदालत के फैसले का हवाला दे रहा है और अमेरिका कुछ दिन पहले ही पेंटागन के दबाव में पाकिस्तान के लिए धन जारी कर रहा है तो लगता है कि सईद के पीछे पाकिस्तानी सरकार और वहां का कट्टरपंथी समाज खड़ा है और अमेरिका जबानी जमा खर्च से ज्यादा कुछ करने का इरादा नहीं रखता। हाफिज पहले लश्कर-ए-तैयबा चलाता था और उस पर पाबंदी के बाद उसने जमात उद दवा बना लिया। लश्कर का नाम 26/11 के मुंबई हमले में प्रमुख्ता से आया था और उसी के बाद दिसंबर 2008 में संयुक्त राष्ट्र सुरक्षा परिषद ने उसे आतंकी घोषित किया। हालांकि, अमेरिका उसी साल मई में ही सईद को आतंकी घोषित कर चुका था। उस पर एक करोड़ डॉलर का ईनाम भी रखा। तब भारत के राजनय ने वैश्विक स्तर पर पाकिस्तान पर भारी दबाव बनाया था। भारत उस दबाव को आगे जारी रख नहीं पाया। ब्रिक्स सम्मेलन की ओर से पाकिस्तानी आतंकियों के विरुद्ध जारी घोषणा के बावजूद अगर पाकिस्तान सईद को रिहा करने की हिम्मत कर रहा है तो स्पष्ट है कि चीन आतंक की महज जबानी आलोचना करना चाहता है। वह जानता है कि मिल्ली मुस्लिम लीग बनाकर राजनीति में उतरने की तैयारी कर चुके आतंकियों के लिए सईद कितना जरूरी है और यह पूरी राजनीति पाकिस्तान के शासक वर्ग को कितनी अनुकूल लगती है। अमेरिका भी पाकिस्तान की उपेक्षा नहीं कर सकता, क्योंकि अफगानिस्तान ही नहीं ईरान के साथ उसके तनाव में उसकी बड़ी जरूरत है। स्पष्ट है कि सईद को अंतरराष्ट्रीय स्तर पर अहमियत दिलाकर पाकिस्तान कश्मीर मसले को और उछालना चाहता है। यह गंभीर राजनयिक चुनौती है, जिसके लिए हमें ठोस प्रयास करने होंगे।