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kameshrathore
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सभापति महोदय, यह मेरा परम सौभाग्य है कि आज इस अवसर पर मुझे देश के उन होनहार युवकों से बातचीत करने का मौका मिला है जो कि यहां पर उपाधि प्राप्त कर रहे हैं । दक्षिण भारत में, जहां की अपनी अलग-अलग भाषाएं हैं, गांधी के प्रयास और स्नेह से हिन्दी के प्रचार का काम शुरू हुआ। गांधी जी एक महान नेता ही नहीं थे बल्कि एक दार्शनिक भी थे । उन्होंने भारत की आजादी की लड़ाई को एक दिशा दी । आजादी मिलने के बाद जो हमारे देश के लिए बाधाएं बन सकती थीं उन सब क बारे में उन्होंने सोचा और उन्हें दूर करने का प्रयास किया । गांधी जी के प्रयास से ही दक्षिण में हिन्दी प्रचार को आजादी के एक प्रमुख साधन के रूप में महत्वपूर्ण स्थान मिला । भारत की आजादी की लड़ाई में ऐसे अनेक साधनों का प्रयोग हुआ जो देश की एकता के लिए महत्व्पूर्ण थे । इन साधनों में हिन्दू-मुस्लिम एकता हरिजन समस्या, जातिवार की समस्या और खादी की समस्या आदि प्रमुख थे । इन सब साधनों के साथ हमें हिन्दी को भी माना । यह इसलिए आवश्यक था कि अपनी भाषा के बिना कोई भी राष्ट्र उन्नति नहीं कर सकता । राष्ट्रभ्ज्ञाषा हिन्दी के बारे में लोगों में अनेक शंकाएं थीं कि दक्षिण भारत में हिन्दी का विरोध होता है परन्तु मैं आपको यह बताना चाहता हूँ कि आजादी के पहले और आजादी की प्राप्ति के बाद भी दक्षिण में कभी भी यह भावना प्ैदा नहीं हुई कि वे हिन्दी का विरोध करें । कुछ राजनीतिज्ञों ने अपने स्वार्थ के लिए भाषा को एक राजनीतिक साधन के रूप मे अपनाया और जनता को गूमराह करने का प्रयास किया । सूचना ओर समाचार माध्यमों ने भी इसे अपने व्यापार को बढ़ाने के एक साधन के रूप में लिया और कुछ लोगों द्वारा कही गई बातों को इस प्रकार जनता के सम्मुख रखा कि लोग समझने लगे कि यह दक्षिण की जनता की भावना है और वह हिन्दी का विरोध कर रही है । यह ठीक है कि यदि उस समय तुरन्त सारा काम हिन्दी में करना आरम्भ कर दिया जाता तो दक्षिण की एकता और अखण्डता के लिए राष्ट्रभाषा बनाया गया था। उसे सभी भाषा-भाषियों के बीच एक पुल का कार्य करना था। अत: यह सोचना हिन्दी को लागू कर अहिन्दी भाषियों को परेशानी में डाला जाएगा , गलत था।