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ashokyadav


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ैन्य बलों के लिए न्यायाधिकरण गठित भी नहीं हुआ है कि इसमें हिंदी और अंग्रेजी की भाषा समेत कई विवाद और अड़चनें पैदा हो गई हैं। न्यायाधिकरण में बहस इस मुद्दे पर है कि सैन्य बलों के कर्मियों को यदि खुद पैरवी का अवसर देना है तो इसके लिए हिंदी में सुनवाई होनी चाहिए, ताकि जवान अपने मामले में अपना पक्ष खुद पेश कर सकें। लेकिन इसके विरोध में दो तर्क हैं। एक तो यह कि उच्च न्यायालय के स्तर के मामले इस न्यायाधिकरण में आएंगे और कानूनी शब्दावली को हिंदी में ढालने और उसी भाषा में जिरह करने में बेहद कठिनाई का सामना करना पड़ सकता है। दूसरा तर्क यह है कि न्यायाधिकरण की प्रधान पीठ नई दिल्ली में स्थापित होने के अलावा चेन्नई, कोच्चि, कोलकाता और गुवाहाटी जैसी क्षेत्रीय पीठ में कौन सी भाषा अपनाई जाएगी, जहां के जवानों की मातृभाषा हिंदी नहीं है। न्यायाधिकरण की क्षेत्रीय पीठें- लखनऊ, चंडीगढ़, जयपुर और मुम्बई में भी होनी है। न्यायाधिकरण का अध्यक्ष न्यायमूर्ति एके. माथुर को नियुक्त किया जा चुका है, लेकिन अभी इसके न्यायिक एवं प्रशासनिक सदस्यों तथा गैर न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति नहीं हुई है। सैन्य न्यायाधिकरण का गठन 15 अगस्त तक हो जाना था, लेकिन कई बाधाओं के कारण यह अधर में झूलता जा रहा है। कानून मंत्रालय का कहना है कि इन सदस्यों की नियुक्ति संघ लोक सेवा आयोग की चयन प्रक्रिया से होनी चाहिए, जबकि रक्षा मंत्रालय स्वयं ये नियुक्तियां करना चाहता है। न्यायाधिकरण के न्यायिक सदस्यों की नियुक्ति में भी पेंच है। उच्च न्यायालयों के कुछ न्यायाधीशों का कहना है कि उन्हें इसका न्यायिक सदस्य बनने पर उच्च न्यायालय के न्यायाधीश के बराबर ही दर्जा और सुविधाएं मिलनी चाहिए। इसी बीच जयपुर की पीठ के गठन के सिलसिले में न्यायमूर्ति माथुर ने पिछले दिनों जयपुर का दौरा किया, जहां उन्हें ऐसी इमारत दिखाई गई जिसकी छत टिन की थी। इसके अलावा यह स्थान छावनी के भीतर था। इमारत की हालत और उसके छावनी के भीतर होने पर न्यायमूर्ति माथुर ने एतराज किया। उनका कहना था कि इस जर्जर इमारत में पीठ कैसे काम करेगी और न्याय के लिए इस प्रतिबंधित इलाके में लोग आसानी से कैसे आएंगे।
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