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tapobhumiclasses
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हमारे लिए यह जान लेना आवश्यक है कि हम कौन हैं क्योंकि अभी तक हम अपने को जिस रूप में जानते हैं वह सही नहीं है। सृष्टि की संरचना और इसमें आने वाले जीव के विषय में जो विचार करते हैं, उनका कहना है कि जैसे ही जीव इस धरती पर कदम रखता है, पांच ज्ञानेद्रियों, पांच कर्मेद्रियों, एक मन और एक बुद्धि से युक्त इसका शरीर भी इसके साथ-साथ चला आता है। हालांकि यह शरीर इसके साथ तो आता है, किंतु यह इसका अपना इसलिए नहीं होता, क्योंकि यह जीव तो उस परब्रह्मा परमात्मा का अंश है, जो जन्म ओर मरण से मुक्त है ओर जिसमें सुख-दुख की व्याप्ति नहीं होती। जीव को कब कौन-सा शरीर मिलेगा और कब कौन-सा शरीर उससे छूट जाएगा, इसका न तो इसे पता होता है और न ही अपना शरीर प्राप्त करना तथा छोड़ना इसके वश में होता है, क्योंकि न तो यह अपने शरीर का स्वामी है और न यह शरीर इसका अपना है। इसलिए इसके छूटने का भय निरर्थक है।
यही स्थिति सांसारिक संबंधों की भी है। इस जीव ने जिस किसी स्त्री के गर्भ से जन्म लिया वही इसकी माता हो गई।