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deepakgaykwad1531495
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होली एक रंगो से भरा और महत्वपूर्ण उत्सव है। इस हर, साल फागुन महीने में पूर्णमासी के दिन मनाया जाता है। लोग इस पर्व का बेहद उस्सुकता से इंतजार करते हैं और उस दिन इसे स्वादिष्ट पकवानों और रंगो के साथ मनाते हैं। बच्चे सुबह से रंगो और पिचकारियों के साथ अपने दोस्तों के बीच चले जाते हैं। दूसरी तरफ घर की महिलाऍ मेहमानों के स्वागत के लिए चिप्स, पापड़, नमकीन और मिठाई, आदि बनाती हैं। यह एक खुशी और सौभाग्य का उत्सव है जो सभी के जीवन में वास्तविक रंग और आनंद लाता हैं। रंगो के माध्यम से सभी के बीच का मतभेद मिट जाता हैं। इस महत्वपूर्ण उत्सव को मनाने के पीछे प्रहलाद और उसकी बुआ होलिका से संबंधित एक पौराणिक कहानी हैं। काफी समय पहले एक असुर राजा था हिरण्यकश्यप। वो प्रहलाद का पिता और होलिका का भाई था। उसे ये वरदान मिला था कि उसे कोई इंसान या जानवर नहीं मार सकता, ना ही किसी अस्त्र या शस्त्र में, न घर के बाहर न अंदर, न दिन में और रात में। इस असीम शक्ति की वजह से हिरण्यकश्यप घमंडी हो गया था और भगवान के बजाय खुद को भगवान समझने लगा था। यह ही नही, अपने पुऋ सहित सभी को अपनी पुजा करने का निर्देश देता था। एक तरफ उसका खौफ था। इसलिए सभी उसकी पूूूूजा करने लगे सिवाए प्रहलाद के क्योंकि वह विष्णु का भक्त था। इस बर्ताव से गुस्सा होकर हिरण्यकश्यप पुत्र प्रहलाद के इस बर्ताव से गुस्सा होकर हिरण्यकश्यप ने अपनी बहन होलिका के साथ मिलकर उसे मारने की योजना बनायी। उसने अपनी बहन होलिका को प्रहलाद को अपनी गोद में लेकर आग में बैठने का आदेश दिया। आग से न जलने का वरदान पाने वाली होलिका भस्म हो गईं। वहीं दूसरी ओर भक्त प्रहलाद को अग्निदेव ने छुआ तक नहीं। उसी समय से हिंदु धर्म के लोगो ने होलिका के नाम पर होली उत्सव की शुरूआत की। इसे हम सभी बुराई पर अच्छाई की जीत के रूप में देखते है। रंग-बिरंगी होली के एक दिन पहले लोग लकड़ी, घांस फूस और गाय के गोबर के ढेर में अपनी सारी बुराईयों को होलिका के साथ जलाकर खाक कर देते हैं। सभी इस उत्सव को गीत संगीत, पकवानों और रंगो में सराबोर होकर मनाते हैं। इसकी तैयारी इसके आने से सात दिन पहले ही शुरू हो जाती हैं। फिर क्या बच्चे और क्या बड़े सभी बेसब्री से इसका इंतजार करते हैं और इसके लिए खूब खरीदारी करते हैं।