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kameshrathore


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ानव-विकास का इतिहास इस बात का साक्षी है कि जब किसी व्‍यक्ति को असीमित शक्ति मिल जाती है तो वह भ्रष्‍ट हो जाता है और उसके प्रयोग से समाज में अत्‍याचार अराजकता और दुर्व्‍यवस्‍था उत्‍पन्‍न हो जाती है। मनुष्‍य की इस शक्ति को सीमित करने के लिए सर्वदा से प्रयास किया जा रहा है और इसी उद्देश्य से ऐसी संस्‍थाओं की स्था्पना की गई है जो इसी शक्ति के दुरूपयोग पर अंकुश लगा सके। समस्‍या तब और भी कठिन हो जाती है जब सरकार मनमाने ढंग से कार्य करने लगती है। विधायिका, कार्यपालिका और न्‍यायपालिका के सम्मिलित नाम को सरकार कहते हैं। सरकार के अंतर्गत यही शक्तियां होती हैं। इस सिद्यांत के अनुसार इन तीनों शक्तियों का पृथक्‍करण आवश्यकक है। राज्‍य की एक शक्ति दूसरी शक्ति के संचालन में हस्‍तक्षेप करे और प्रत्‍येक अंग अपनी शसीम में रहकर कार्य करें तथा सरकार के एक अंग में सारी शक्ति का केंद्रीयकरण हो, यही आवश्‍यक है। इन शक्तियों में आपस में संतुलन स्‍थापित करके ही मनुष्‍य के स्‍वेच्‍छाचारी एवं निरंकुश स्‍वाभाव पर अंकुश लगाया जा सकता है और संविधान प्रदत्‍त स्‍वतंत्रता‍ओं की रक्षा की जा सकती है। इस प्रकार न्‍यायिक पुनर्विलोकन विधायिका, कार्यपालिका और न्‍यायपालिका शक्तियों के प्रयोग पर नियंत्रण रखने की आवश्‍यकता है। न्‍यायिक पुनर्विलोन की धारणा का उद्भव सीमित शक्ति वाली सरकार के सिद्धांत से हुआ है। इस सिद्धांत के अनुसार विधि दो प्रकार की होती है- एक साधारण विधि और दूसरी सर्वोच्‍च विधि अर्थात संविधान। देश की सर्वोच्‍च विधि अन्‍य सभी विधियों का आधार और स्‍त्रोत होती है। ऐसी कोई भी विधि जो संविधान के उपबंधों का अतिलंघन या अतिक्रमण करती है, असंवैधानिक मानी जाएगी। याची का दावा इस आधार पर खारिज किया गया कि चूंकि उसे समीति बंधक के नवनिर्मित कॉडर में स्‍थायी नहीं किया गया था- राज्‍य सरकार द्वारा दिनांक 9/6/1999 को जारी किया गए परिपत्र के बल पर, एक कर्मचारी का एक स्था‍न से दूसरे स्‍थान पर स्‍थानांतरण के कारण उत्‍पन्‍न हुइ रिक्ति पर याची की पदोन्‍नति को निरस्‍त किया गया और उसे उसके मूल पद पर प्रत्‍यावर्तित किया गया- अभिनिर्धारित- एक नगर पालिका से दूसरी में किसी कर्मचारी के स्‍थानांतरण के फलसवरूप उत्‍पन्‍न रिक्ति के पद पर पदोन्‍नति के संबंध में परिपत्र दिनांक 9/6/1999 में कोई निर्बंधन नहीं लगाया गया है। वास्‍तव में, उक्‍त परिपत्र का उद्देश्य‍ यह है कि ऐसी उपलब्‍ध रिक्ति को सी‍धी भर्ति द्वारा भरा जाए, क्‍योंकि स्‍थानांतरित कर्मचारी का लियन सदैव सुरक्षित रहता है- संपूर्ण परिपत्र का पठन एवं अर्थान्‍वयन किया गया- याचिका मंजूर, किन्‍तु याची को पदोन्‍नत पद पर स्‍थायी नहीं माना जा सकता।
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