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kameshrathore
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राष्ट्रीय स्वयं सेवक संघ ने अपने प्रमुख मोहन भागवत की मौजूदगी में हिन्दुत्व की अखण्डता का मुद्दा उठाया है। गांव में एक मन्दिर, एक तालाब की अवधारणा को स्थापित करने का आह्वान किया है। कुछ ही दिन पूर्व भागवत ने यह भी कहा था कि हिन्दुस्तान में रहने वाला हर व्यक्ति हिन्दू है। भागवत यह भी जानते होंगे कि जातिगत आरक्षण के कारण हिन्दुत्व पहले ही दो धड़ों में बट चुका है और केन्द्र सरकार इसके पुन: एकीकरण पर विचार करने वाली नहीं है। इसके बिना बात आगे बढ़ने वाली भी नहीं है। आज जिस प्रकार हिन्दू -मुस्लिम समुदायों का ध्रुवीकरण बढ़ रहा है, उससे कहीं अधिक गहरी खाई जातिगत आरक्षण ने हिन्दुओं में पैदा कर दी है। राजनीति के आगे देशहित गौण हो चुका है। यदि हर देशवासी हिन्दू है तब क्यों अल्पसंख्यक वाद और कैसा आरक्षण? और क्यों हिन्दू समानता का नया अभियान? संघ प्रमुख ने अपनी मुहिम में बहुत देर कर दी। क्या वे मुस्लिम समुदाय को हिन्दू मानने का वातावरण बना सकेंगे अथवा ईसाइसों को हिन्दू का दर्जा दे सकेंगे। आरक्षण ने जहर देश में घोल दिया है, उसके रहते क्या दोनों धड़े फिर से साथ हो सकेंगे? संभावना नहीं है। बढ़ती कट्टरवादी मानसिकता ने, चुनावों तथा नौकरियों के आरक्षण ने देश में जो असुरक्षा का वातावरण बना दिया है, सवर्ण मुंह ताकने वाला हो गया, आरक्षण के बूते अक्षम भी आगे बढ़ने लगा, उस स्थिति में फिर सवर्ण ही उसे गले लगा लेगा, यह असंभव नहीं तो कठिन जरूर है।
सत्ता में भागीदारी की परोक्ष मानसिकता भी संघ में प्रस्फुटित हुई है। भाजपा ने अपना रुख भी नरम किया है। तब संघ की मुहिम क्या दलितवर्ग की पहुंच बढ़ाने का एक रास्ता और नहीं खोल देगी? भागवत का आह्वान देश के हित के हितकारी तभी हो सकता है, जब शुरू का कदम जाति आधारित आरक्षण का गुट इनके साथ बैठने को तैयार नहीं हो सकता। न ही केन्द्र सरकार इनको बिना कानून बदले एक कर सकेगी। यह कटु सत्य है। भागवत जी, जब आपके कार्यकर्ता गांवों में पहुंचेंगे, ग्रामीण इनके समक्ष प्रश्नों की झड़ी लगा देंगे। उत्तर देना सहज नहीं होगा, न ही वहां कन्नी काट पाएंगे। दोनों धड़े भी आमने-सामने होंगे। आपके कार्यकर्ता गालियां भी न सुन पाएंगे, न सहन कर पाएंगे। जीवन में सब सहज भले ना हो लेकिन असंभव कुछ भी नहीं, यदि हमारा संकल्प दृढ़ हो और निष्ठा के साथ सब जुट जाएं। देशहित में सब में सब अपना-अपना स्वार्थ त्याग कर कार्य जट जाएं। यदि देशहित में अपना-अपना स्वार्थ त्याग कर कार्य करने लगें, स्वयं फल न खाकर देश को अर्पित कर सकें, तो ही लक्ष्य प्राप्ति संभव है।