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kameshrathore
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किसी माँ-बाप को अपने बच्चों के सम्बन्ध में इस प्रकार का अधिकार नहीं होता कि वह इस अधिकार के उल्लंघन के लिए किसी अन्य व्यक्ति के विरूद्ध नुकसानी की कार्यवाही कर सके। माँ-बाप के रूप में उन्हें सिर्फ बच्चे की अवयस्क अवस्था में उनके कब्जे एवं संरक्षण का अधिकार होता है।
परन्तु पिता को (अथवा ऐसे व्यक्ति को जो पिता की स्थिति में स्थित व्यक्ति) ऐसे व्यक्ति के विरूद्ध वाद संस्थित कर सकता है। यह अधिकार उनमें माता या पिता होने के कारण निहित नहीें होता वरन् इस अधिकार के कारण कि वे बच्चों के स्वामी जैसे माने जाते हैं। इस बात का सबूत कि माता-पिता के साथ रह रहे थे अथवा नहीं। यदि कोई व्यक्ति बच्चे को उठा ले जाता है, कैद कर लेता है अथवा शारीरिक चोट पहुँचाता है, तो पिता (अथवा पिता की स्थिति का व्यक्ति) एेसे वयक्ति के विरूद्ध वाद ला सकता है। ऐसे वाद में यह साबित किया जाना चाहिए कि पिता और बच्चे में स्वामी एवं सेवब का सम्बन्ध था। यदि इस प्रकार का सम्बन्ध नहीें है तो पिता को बच्चों के सम्बन्ध में किये गये अपकृत्य के लिए कोई उपचार उपलब्ध नहीें होगा। यदि बच्चा बहुत कम उम्र का है अथवा किसी अन्य व्यक्ति की सेवा में है अथवा अन्य किसी कारण से पिता की सेवा करने में असमर्थ है तो पिता को यह उपचार प्राप्त नहीें होगा। वह कार्य बलात्संग, विलुब्ध किया जाना अथवा फुसलाया जाना पर आधारित अपकृत्य के अतिरिक्त अन्य अपकृत्य हो और यह अपकृत्य बच्चे के विरूद्ध हो। पिता यह कृत्य की वजह से बच्चे की सेवा से वंचित हो जाय।
सामान्य विधि के अन्तर्गत सेवा के योग्य अवयस्क बच्चे को माँ-बाप की इच्छा के विरूद्ध माँ-बाप को त्यागने के लिए बहकाना, अथवा यदि उसने माँ-बाप को छोड़ दिया है तो घर न लौटने के लिए बहकाना को कानून सुधार (विविध उपबन्ध) अधिनियम 1970 की धारा-5 द्वारा समाप्त कर दिया गया है। इस धारा के द्वारा बच्चे के साथ बलात्संग अथवा विलुब्ध किए जाने के कारण सेवा से वंचित होने पर पिता को सामान्य विधि में अपकृत्य की कार्यवाही का जो अधिकार दिया गया था, उसे समाप्त कर दिया गया है।