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VarunTiwari


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्रत्‍येक जीवित व्‍यक्ति ऊर्जा प्राप्‍त करने के लिए आहार की अपेक्षा करता है, जिसके माध्‍यम से वह अपनी क्रिया-कलाप को संचालित करता है। यदि उसके द्वारा ग्रहण किया गया भोजन प्रदूषित और अपमिश्रित है, तो उसका उस पर हानिकारक प्रभाव होगा। खाद्य पदार्थ अपने स्‍त्रोत से अपने प्रयोग तक प्रदुषित हो जाता है। प्रत्‍येक जीवित व्‍यक्ति को प्रकृति द्वारा गुण प्रदान किया गया है, जिसके माध्‍यक से वह यह निर्णय करता है कि भोजन उपभोग के लिए उपयुक्‍त है या नहीं। मनुष्य, भोजन ग्रहण करने के पहले उसका निरीक्षण करता है। इस अंतर्निहित गुण के अतिरिक्‍त मनुष्य भोजन की गुणवत्‍ता का निश्‍चय करने के लिए कतिपय अन्य परीक्षणों का विकास किए है। धार्मिक आचरण में वे क्रियाएं सम्मिलित हैं जिनमें धर्म का तत्व प्रधान होता है। इसमें लौकिक क्रियाएं सम्मिलित नहीं हैं, क्‍योंक‍ि इनमें धार्मिक तत्‍व कम और सांसारिक तत्‍व अधिक होते हैं। यह पता लगाना कठिन है कि कौन सी क्रियाएं आचरण के अंतर्गत आती हैं। कांग्रेस सरकार द्वारा नियुक्‍त संविधान समीति का मत था कि जहां संविधान में नागरिकों के मूल अधिकारों का उल्‍लेख किया गया है, वहां मूल कर्त्‍तव्‍यों का भी समावेश होना चाहिए। अधिकार और कर्त्‍तव्‍य एक दूसरे के अन्‍योन्‍याश्रित होते हैं। प्रस्‍तुत संशोधन संविधान की इसी कमि को दूर करने के लिए पारित किया गया है। दण्‍ड संहिता धाराएं 302, 34-अभियोजन साक्षी क्रमांक 2 ने कथन किया कि मृतक पर तुलसीदास ने हमला किया जबकि अन्य प्रत्‍यक्षदर्शी साक्षियों ने नहीं कहा कि तुलसीदास ने मृतक पर हमला किया- यदि अभियोजन साक्षी क्रमांक 2 ने तुलसीदास को मृतक पर हमला करते देखा होता, तब अन्‍य साक्षियों ने इस तथ्‍य की पुष्टि की होती- नहीं कहा जा सकता कि तुलसीदास का सामान्‍य आशय था- तृतीय अपीलार्थी अन्य‍ दो अपीलार्थियों के साथ अपने हाथ में टांगी लेकर घटना स्‍थल पर आया, परंतु उसकी ओर से कोई प्रत्‍यक्षकृत नहीं है- इस संभावना से इंकार नहीं किया जा सकता कि घटना स्‍थल पर पहुंचने के पश्‍चात उसने अपना मन बदला होगा। गृह अतिचार- घटना आंगन में घटी- आंगन चारों तरफ दीवार और शिकायतकर्ता के मकान के कमरों से घिरा था- उसका एक प्रवेश द्वार था और यदि प्रवेश द्वार बंद हो, कोई प्रवेश नहीं कर सकता था- अभिनिर्धारित घटना स्‍थल और कुछ नहीं बल्कि मकान का हिस्सा है- अपीलार्थी क्रमांक 1 2 भा.द.सं. की धारा 450 के अंतर्गत अपराध हेतु दोषी नहीं- अभिस्‍थापित दण्ड संहिता धारा 307- हत्‍या का प्रयास- अपीलार्थी क्रमांक 1 ने गोली चलाकर शिकायतकर्ता को कोहनी पर साधारण चोट कारित की- अभिनिर्धारित यदि अपीलार्थी क्रमांक 1 का सम्‍पूर्ण आचरण विचार में लिया जाए, तब यह प्रकट होता है कि उसका आशय शिकायतकर्ता को जान से मारने का था- अपीलार्थी क्रमांक 1 ने भा.द.सं. की धारा 307 के अंतर्गत अपराध कारित किया है।
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