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kishorepathade


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तंकी संगठनों की सक्रियता की अनदेखी करने के पाकिस्‍तान के रवैए पर अमेरिका चेतावनी देता रहता था, पर अब उसे लगा कि केवल चेतावनी देते रहने से कोई फर्क नहीं पड़ेगा। यहां यह भी गौरतलब है कि अमेरिका ने हक्‍कानी नेटवर्क और अफगान-तालिबान पर नकेल कसने का दोष तो पाकिस्‍तान पर मढ़ा ही है, उन आतंकी संगठनों पर शिकंजा कसने के लिए भी प‍ाकिस्‍तान को धिक्‍कारा है जो खासकर भारत को निशाना बनाते रहे हैं। लिहाजा, ट्रंप प्रशासन की ताजा कार्रवाई भारत के लिए महत्‍वपूर्ण कूटनीतिक उप‍लब्धि भी है। पर क्‍या अमेरिका पाकिस्‍तान के प्रति अपनी सख्‍ती पर कायम रहेगा? यह सवाल दो करणों से उठता है। एक तो इसलिए कि पाकिस्‍तान को अमेरिका से मिलती रही सुरक्षा सहायता कोई खैरात नहीं है; यह कथित सहायता काफी हद तक खुद अमेरिका से हथियार खरीदने के काम आती रही है। दूसरे, अफगानिस्‍तान में अपने सामरिक हितों के लिए पाकिस्‍तान को खुश रखना अमेरिका के लिए जरूरी है। अफगानिस्‍तान में मौजूद अमेरिकी सैनिकों के लिए सारी अापूर्ति पाकिस्‍तान होकर ही होती है। अगर पाकिस्‍तान यह रास्‍ता बंद कर दे, जैसा कि 2011 में उसने कुछ समय के लिए किया था, तो अमेरिका को वैकल्पिक मार्ग ढूंढ़ना होगा। रूस और मध्‍य एशिया होकर अफगानिस्‍तान तक आपूर्ति का रास्‍ता चुनना बहुत खर्चीला साबित होगा।
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