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VarunTiwari
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इसी दौरान रेस्पोण्डेण्ट ने व्यवाहर प्रक्रिया संहिता के आदेश 14 नियम 4 तथा आदेश 11 नियम 14 के अन्तर्गत प्रार्थना के साथ उल्लिखित सूची अनुसार कुछ कागजात प्रस्तुत करने हेतु प्रार्थना-पत्र प्रस्तुत किया। विचारण न्यायालय ने उक्त कागजातों को प्रस्तुत करने हेतु नोटिस जारी किये। उसके उत्तर में अपीलाण्ट की ओरसे साक्ष्य अधिनियम की धारा 123 के अन्तर्गत उन कागजातों को प्रस्तुत करने में विशेषाधिकार की मॉंग की। दोनों पक्षों को सुनने के पश्चात् विचारण न्यायालय ने अपीलाण्ट के विशेषाधिकार की माँग को स्वीकार किया। विचारण न्यायालय ने अपीलाण्ट के पक्ष में निर्णय किया। रेस्पोण्डेण्ट ने उच्च आदेश के विरूद्ध पंजीब उच्च न्यायालय में रिवीजन दायर किया वह रिवीजन स्वीकार किया गया। विशेष इजाजत लेकर अपीलाण्ट ने यह अपील उच्चतम न्यायालय में दायर की। अपील में अपीलाण्ट की आरे से यह तर्क प्रस्तुत किया गया कि साक्ष्य अधिनियम की धाराओं 123 एवं 162 के वास्तविक अर्थ को छुपाकर उच्च न्यायालय ने यह गलत निर्णय दिया कि अपीलाण्ट विशेषाधिकार की मॉंग नहीं कर सकता है। साक्ष्य अधिनियम की धारा 123 की धारा 123 के अन्तर्गत किसी भी व्यक्ति को उन सभी बिना प्रकाशित दस्तावेजों को सिद्ध करने के लिए इजाजत नहीं दी जायेगी जो कि शासन के कार्य से सम्बन्धित है यदि विभाग का मुख्य इजाजत दे देता है, तो वह उन दस्तावेजों को सिद्ध करता है। उस ऑफिसर को हक होगा कि वह इजाजत दे अथवा नहीं। साक्ष्य अधिनियम की धारा 123 के अन्तर्गत उपस्थित आपत्ति के प्रमाणीकरण हेतु न्यायालय सम्बन्धित कागजातों में क्या लिखा है इसके लिए साक्ष्य स्वीकार नहीं की जा सकती है। दस्तावेजों को प्रस्तुत करने के लिए तीन विचार हैं जो निम्न हैं- 1. विभाग का मुख्य काम यह बताना है कि दस्तावेज किस किस्म का है यदि उसका विचार यह है कि दस्तावेज खास है तो वह उसको प्रस्तुत करने की इजाजत दे सकता है यदि उसके विचार से वह दस्तावेज बेकार है, तो वह दस्तावेज को प्रस्तुत करने के इन्कार कर सकता है। 2. न्यायालय प्रारम्भिक जॉंच करके यह निर्णय दे सकता है कि यह दस्तावेज किस किस्म का है तथा उसके बाद उसको प्रस्तुत करने का आदेश पारित कर सकता है। 3. दस्तावेज की जॉंच करने के पश्चात् न्यायालय का यदि यह विचार होता है कि दस्तावेज बेकार है