words per minute
5
tapobhumiclasses
00:00
Speed
हम न चाहते हुए अनेक प्रकार की भावनाओं से परिपूर्ण होते हैं और उनसे प्रेरित होकर कर्म करते हैं। हमारी भावनाएं ही विविध रूपों में हमारे समक्ष आती हैं। जो भावना उतनी दूरी तक जा सकती है। यदि कोई कर्म किया जाता है, परंतु उसमे भाव नहीं है और केवल विचार है तो वह किसी को भी प्रभावित नहीं कर सकता । भगवान तक पहुंचना तो बहुत दुर की बात है। जीवन में भावना ही कर्म है। जहां पर भावना नहीं है तो कर्म मात्र किया रह जाता है, जिसका प्रभाव तात्कालिक होता है। क्रिया भावना युक्त होकर कर्म लंबे वक्त तक साथ रहता है और अपना प्रभाव भी दिखाता है। यदि कोई मनुष्य किसी शेर का शिकार अपना शौक पूरा करने के लिए करता है तो उसे पाप लगता है, जो एक हत्या है क्योंकि उस मनुष्य के कर्म के पीछे निजी स्वार्थ है, परंतु यदि वही मनुष्य शेर के आतंक से भयभीत मनुष्यों की रक्षा करने के लिए अर्थात लोकहित की भावना से उसे शेर की हत्या करता है तो उसे पाप नहीं लगता। जैसी हमारी भावना होती है, वैसी ही हमारी गति होती है। यदि हमारी भावना अशुद्ध है तो हमारी गति विनाशकारी होगी और यदि हमारी भावना शुद्ध है तो हमारी गति भी कल्याणकारी होगी। निष्कपट भावनाएं भगवान को अतिप्रिय होती हैं। हम अनुभव कर सकते हैं कि भावना अभिव्यक्ति पाती है। किसी व्यक्ति के हाव-भाव से उसकी भावनाओं का पता चलता है। भावनाओं से रहित व्यक्ति संवेदनशील होता है और भावनाओं से रहित व्यक्ति पत्थर की तरह होता है। जिस तरह होता है। जिस तरह से जैसी प्रकृति होती है, उस व्यक्ति की भावनाएं भी उसके चारों ओर उसके अनुरूप फैलती हैं। कोई कार्य यदि दो व्यक्ति अलग-अलग भाव से कर रहे है तो उसके परिणाम भी अलग-अलग होते हैं। इसलिए भगवान भी भक्ति से भरे भाव को सबसे महत्वपूर्ण मानते हैं, क्योंकि भावनाएं ही हैं जो भगवान तक सरलता से पहुंच सकती है। न तो व्यक्ति का शरीर ही भगवान तक पहुंच सकता