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PankajKumarMishra


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्‍यायालयों में अब प्रसाद का सिद्धांत कोई स्‍वैच्छिक या प्राविधिक सिद्धांत नहीं है। जहां कोई उपचार प्रदान करना या तो इस कारण व्‍यावहारिक रूप से अन्‍यायपूर्ण होगा कि प्राक्षकार ने अपने आचरण द्वारा जो कुछ किया है उचित रूप सें उसे अभित्‍यजन के समतुल्‍य माना जा सकता है अथवा जहां अपने आचरण या उपेक्षा द्वारा यद्यपि उसके संभवत: उस उपचार का अभित्‍यजन भी किया हो तो उसने दूसरे पक्षकार को ऐसी स्थिति में रख दिया है कि यदि इस उपचार का बाद में प्राख्‍यान किया जाए तो उसका स्‍थापन युक्तियुक्‍त नहीं होगा। किन्‍तु दोनों मामलों में से हर एक में समय का व्‍यपगमन और विलंब सर्वाधिक तात्विक है किन्‍तु हर मामले में यदि अनुतोष के विरूद्ध दिए जाने वाले तर्क को अन्‍यथा न्‍यायसंगत होगा केवल विलंब की बात पर आधारित किया जाता है और वह विलंब परिसीमा संबंधी किसी कानून के अनुसार वस्‍तुत: वर्जन की कोटि में नहीं आता है तो उस प्रतिरक्षा की विधिमान्‍यता का विचारण ऐसे सिद्धांतों के आधार पर किया जाना चाहिए जो सारत: साम्‍यपूर्ण हो। ऐसे मामलों में जो दो परिस्थितियां सदा महत्‍वपूर्ण होती हैं वे हैं विलंब की अवधि और उस अंतरा‍वधि के दौरान किए गए कार्यों की प्रकृति जिनका दोनों में से किसी पक्षकार पर प्रभाव पड सकता है हो और जहां तक उस उपचार का संबंध है अथवा दूसरा मार्ग ग्रहण करने में अन्‍याय अथवा न्‍याय का संतुलन होता हो। अत: विलंब और प्रमाद के सिद्धांत की अकारण उपेक्षा नहीं करनी चाहिए। रिट न्‍यायालय से यह अपेक्षित है कि वह दिए गए स्‍पष्‍टीकरण और उसकी स्‍वीकार्यता को महत्‍व दे। न्‍यायालय को यह ध्‍यान में रखना चाहिए कि वह असाधारण और साम्‍यापूर्ण अधिकारिता का प्रयोग कर रहा है। सांवधिानिक न्‍यायालय के रूप में उसका यह कर्तव्‍य है कि नागरिकों के अधिकारों की संरक्षा की जाए किन्‍तु इसके साथ साथ उसे स्‍वयं को इस प्रमुख सिद्धांत से अवगत रखना होगा कि जब कोई व्‍यथित व्‍यक्ति पर्याप्‍त कारण के बिना अपनी सुविधा या प्रसादानुसार न्‍यायालय में समावेदन करता है तो न्‍यायालय इस बात की संवीक्षा करने संबंधी विधि बाध्‍यता के अधीन होगा कि विलंबित प्रक्रम पर मुकदमेबाजी ग्रहण की जाए अथवा नहीं
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