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PankajKumarMishra
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आदरणीय मुख्य न्यायाधीश, बहुत ही पीड़ा और चिंता के साथ हमने ये खत लिखने की जरूरत महसूस की है जिससे हाल के समय में इस अदालत द्वारा लिए गए कुछ फैसलों पर आपका ध्यान आकृष्ट कर सकें। इन फैसलों ने पूरी न्यायिक प्रणाली और हाईकोर्ट की आजादी पर प्रतिकूल प्रभाव डालने के साथ ही मुख्य न्यायाधीश कार्यालय की प्रशासनिक कार्यपद्धति पर गहरा असर डाला है। कलकत्ता, बॉम्बे और मद्रास हाईकोर्ट की स्थापना के बाद से ही न्यायिक प्रणाली की अपनी कुछ परंपराएं और मान्यताएं स्थापित हुई हैं। इन्हीं परम्पराओं को इस अदालत ने भी स्वीकार किया जिसकी स्थापना इनके करीब एक सदी बाद हुई। इन परम्पराओं का आधार एंग्लो-सैक्सन विधिशास्त्र और व्यवहार रहा है। मुख्य न्यायाधीश के रॉस्टर या कार्यतालिका बनाने का विशेषाधिकार इन्हीं स्थापित सिंद्धांतों में से है। बहुसंख्यक अदालती प्रणाली में कार्य के उचित निष्पादन और विषय की गंभीरता, स्वभाव और जरूरत के अनुसार कौन सा मामला किस सदस्य/कोर्ट के पास जाएगा इसका निर्धारण किया जाता है। मुख्य न्यायाधीश के पास रॉस्टर निर्धारित करने से जुड़ी परम्परा इस बात पर निर्धारित की गई थी कि अदालतों में काम का निष्पादन अनुशासित और उचित तरीके से हो। इसका अर्थ सीजेआई की वरिष्ठता को स्वीकार करना नहीं था। इस देश के विधिशास्त्र में ये एक पूरी तरह से स्थापित तथ्य है कि मुख्य न्यायाधीश अपने सहकर्मियों में सिर्फ प्रथम हैं उनसे ज्यादा या कम नहीं। रॉस्टर के निर्माण में उन्हें निर्देशित करने के लिए पूर्व स्थापित और समय की कसौटी पर परखे गए सिद्धांत हैं। चाहे वो किसी मामले या विशेष मामले में न्यायाधीशों की संख्या या संगठन तय करने की बात ही क्यों न हो। इन सिद्धांतों से ही तय, दूसरा नियम यह है कि रॉस्टर में इस अदालत समेत किसी भी न्यायिक इकाई की ओर से हस्तक्षेप नहीं किया जाएगा, न ही संगठनात्मक या न संख्यात्मक आधार पर। इन दो नियमों को नहीं मानने से न सिर्फ अप्रिय और अरुचिकर नतीजे आएंगे बल्कि इस संस्थान की निष्ठा और अखंडता पर भी सवालिया निशान खड़े होंगे। इसकी वजह से होने वाले उथल-पुथल की बात तो कल्पना भी नहीं की जा सकती। हमें बड़े ही दु:ख के साथ ये कहना पड़ रहा है कि पिछले कुछ दिनों में इन दो नियमों का पालना नहीं किया जा रहा है।