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PankajKumarMishra


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र्वोच्‍च न्‍यायालय ने 7 दिसंबर, 2006 को एक महत्‍वपूर्ण निर्णय में कहा कि किसी लोकसेवक द्वारा पद की आड़ में निजी लाभ के लिये किये गये अपराध के मामले में उसके खिलाफ मुकदमा चलाने के लिये सक्षम अधिकारी से पूर्व अनुमति के संबंध में मिली छूट लागू नहीं होगी। उल्‍लेखनीय है कि भ्रष्‍टाचार निरोधक कानून की धारा 19(1) और सीआरपीसी की धारा 197 में ऐसी व्‍यवस्‍था की गयी है कि राज्‍य या केंद्र सरकार के किसी अधिकारी, मंत्री, विधायक या सांसद के विरूद्ध किसी आपराधिक या भ्रष्‍टाचार के मामले में मुकदमा चलाने से पहले सक्षम अधिकारी से मंजूरी लेना आवश्‍यक है। इस मामले में सर्वोच्‍च न्‍यायालय ने कहा है कि यह छूट सिर्फ लोकसेवक के पद के कर्तव्‍य निर्वहन के दौरान किये गये अपराध के मामले में मिली हुयी है। जो अपराध कर्तव्‍य निर्वहन के दौरान नहीं किये गये हैं, उन मामलों में लोकसेवक से पूर्व अनुमति लेने की जरूरत नहीं है। यह निर्णय न्‍यायमूर्ति अरिजित पसायत एव एसएच कपाडिया की पीठ ने दिया। न्‍यायालय ने इस निर्णय के द्वारा स्‍पष्‍ट किया है कि लोकसेवक के खिलाफ भ्रष्‍टाचार या अपराध का मामला चलाने से पहले इजाजत लेने की व्‍यवस्‍था इसलिये हैं ताकि किसी कर्तव्‍यनिष्‍ठ सेवक को उसके कर्तव्‍यपालन के लिए बेवजह परेशान नहीं कया जा सके। इसलिये इस तरह के प्रावधान की जरूरत तभी है जब कोई मामला किसी को पेरशान करने की नीयत से शुरू किया जाये। ऐसी स्थिति में इस व्‍यवस्‍था का लाभ लेने के लिये उस जनसेवक को यह दिखाना होगा कि जिस कार्य के लिये उस पर काय्रवाही होने जा रही है, वह उसके तत्‍कालिक दायित्‍व का हिस्‍सा था। न्‍यायालय ने यह भी कहा है कि जरूरी नहीं कि हर मामले में सक्षम अधिकारी से इजाजत मामला शुरू करने से पहले ही ली जाये। जरूरत हो तो कार्यवाही शुरू की जा सकती है और चार्ज फ्रेम करने के समय तक इजाजत मांगी जा सकती है। इसके साथ ही न्‍यायालय ने कार्यवाही के मामले में नीयत और पूर्वाग्रह को ध्‍यान में रखने का भी सुझाव दिया है। सर्वोच्‍च न्‍यायालय का यह फैसला इस व्‍यवस्‍था के उद्देश्‍य और उसके इस्‍तेमाल के तरीके को पारदर्शी बनाता है और इसे उसके दुरूपयोग की संभावना कम होना दर्शाता है। इसके
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