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ManojRawat1418602


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ुछ यादें बचपन की कभी नही भूलती हैं जब कभी उसी प्रकार की परिस्थितियाँ देखने को मिलती हैं तो हमारी यादें बिन बुलाए मेहमान की तरह अा टपकती हैं। आज जब धूप में बैठ कर छुट्टी का मज़ा लेते हुए अचार के साथ पराँठे खा रहा था तो मुझे वो पराँठे की बोटी भी याद ही गई जो मेरे उस प्यारे से दूध के दाँत को ले बैठी थी। कैसे भूल सकता हूँ मै वो पराँठा ? वो आलू का पराँठा जो सर्दी की धूप में लॉन में बैठ कर बड़े मज़े से खा रहा था। पराँठे तो सर्दियों में सभी तरह के अच्छे लगते हैं मगर आलू का पराँठा और अचार का मेल सोच कर ही मुँह में पानी भर देता है। ऐसा बचपन में भी हुआ था। धूप में बैठ जब आलू का पराँठा खा रहा था तभी अचानक लगा कि इसे और रुचीकर बना कर खाता हूँ । पराँठे पर थोड़ा सा आम के अचार का मसाला फैलाया और रोल कर लिया बस फिर क्या था लगा घुम-घुम कर खाने। माँ हमेशा टोकती थी कि एक जगह टिक कर बैठ कर खाया करो मै माँ की ये बात अक्सर सुन कर अनसुना कर देता था। मै जानता था कि इस प्रकार से खाने में माँ कोई ज़्यादा से अनुशासनिक क़ानून नही लगाती थी क्योंकि मैने एक बार दादी को ये कहते हुए सुन लिया था कि खाने दे इसे खेल-खेल में ये जल्दी खा लेता है,हाँ बाक़ी सभी जगह अनुशासन की पालना अच्छे से करवाती थी । हाँ तो दोस्तों हुआ यूँ कि पराँठे को काटते समय आम की गुठली दाँत के नीचे क्या आई मेरे सामने के ऊपर वाले दाँत में दर्द की लहर दौड़ गई। मैने दाँत को छू कर देखा तो वह हिल रहा था। सामने का दूध का दाँत क्या हिला मानों मेरी तो दुनियाँ ही हिल गई थी। पूँजी जो थी वो मेरे उस...... तब तक के जीवन भर की। इसके बाद तो मै जब भी खाना खाता आराम से ध्यान से खाता कहीं दाँत टूट जाए। दर्द तो कम हो गया था मगर वह बहुत अधिक हिलने लग गया था। और जीभ उसे तो एक नया काम मिल गया। पूरे दिन दाँत को झूला देती रहती। इतना बचा कर रखने के बावजूद एक दिन केला खाते-खाते केले की बोटी में फँस गया। मै हैरान कि केले में बीज तो नही होता मगर दाढ़ के बीच में कुछ तो है निकाल कर देखा तो दाँत हिलने के बाद इतना अधिक संभाल कर रखने के बावजूद भी आख़िरकार उसने मेरा साथ छोड़ ही दिया। कुछ दिन बाद ही मेरा जन्म-दिन ! 'हैप्पी बर्थडे' की मोमबत्ती को बुझाने में जो भारी संघर्ष किया और जो मेरी खिल्ली उड़ी सब याद है मुझे आज भी। मै फूँक रहा था हवा उस लौ पर और वह टूटे दाँत के झरोखे से कही ओर ही भाग जाती थी। हर बार मोमबत्ती बुझाने में असफल दोस्तों के बीच हँसी का पात्र बना। दोस्तों एक दुख आप लोगों से साँझा कर रहा हूँ कि जब दाँत टूटा हो तब जन्मदिन नही आना चाहिये। जीभ तो सबसे ज़्यादा मज़े लेती है ऐसी परिस्थिति के। मेरी जीभ तब मेरे बिलकुल भी क़ाबू में रही,जब देखो झाँक जाती थी मेरे मुख-मंडल के उस झरोंखे से बाहर और मुझे पता भी नही लगता था। उस सर्दी के मौसम में गन्ने चूसने के आनन्द से भी वंचित रहा सो अलग। जब तक नया दाँत नही आया बहुत भारी परेशानी में तो रहा मगर मैने अपनी ग़लत आदत अवश्य सुधार ली। इसके बाद खाना हमेशा साफ़ हाथों से आराम से बैठ कर ध्यान से खाता था।
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