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VISHNUPARASHAR
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सौर प्रणाली का सूर्य, एक प्रमुख तारा है। ब्रह्माण्ड में स्थित अन्य तारों की तुलन में सूर्य का आकार और द्युति (चमक) मध्यम स्तर की है। सूर्य हमारे सबसे निकट होने के कारण आकार एवं द्युति में अन्य तारों की तुलना में बड़ा और प्रकाशमाान दिखाई देता है। पूरी सौर प्रणाली के कुल पदार्थ का 99 प्रतिशत से अधिक भाग सूर्य ही हैं। साौर प्रणाली की समस्त ऊर्जा का प्रमुख स्त्रोत भी सूर्य ही हैं। हमारी पृथ्वी अपनी समस्त ऊर्जा, दृश्य एवं अदृश्य प्रकाश तथा ऊष्मा के रूप में सूर्य से ही प्राप्त करती हैं। हम सौभाग्यशाली हैं कि सूर्य से हमें उतनी ही मात्रा में ऊर्जा मिलती है जो पृथ्वी पर जीवन यापन और उसे जीवित ग्रह बनाये रखने में मददगार होती हैं। सूर्य का व्यास पृथ्वी के व्यास का लगभग 100 गुना हैं और इसका द्रव्यमान पृथ्वी के द्रव्यमान का लगभग 10 लाख गुना हैं। सूर्य ठोस पिण्ड नहीं बल्कि गर्म गैसों का गोला है। इसमें मुख्य रूप से हाइड्रोजन गैस उपस्थित हैं। सूर्य के केन्द्रीय भाग को नाभिक कहते हैं। नाभिक का ताप लगभग दो करोड़ केल्विन होता हैं। इतने उच्च ताप एवं दाब पर नाभिकीय संलयन क्रिया सम्पन्न होती हैं जिससे सूर्य में असीम ऊर्जा का निर्माण होता हैं।
सूर्य के नाभिक से बाहर लगभग 800 किमी से 1600 किमी तक तापोज्जवल परत हैं। इस परत को प्रकाश मण्डल कहते हैं। प्रकाश मण्डल का ताप लगभग 6000 हैं। प्रकाश मण्डल के बाहर भी गर्म गैंसों की परत होती हैं, परन्तु इनका घनत्व बहुत कम होता हैं। इस परत को वर्ण मण्डल या कोरोना कहते हैं। लेटिन भाषा के कोरोना शब्द का हिन्दी भाषा में अर्थ मुकुट हैं। यह परत कम मात्रा में प्रकाश मण्डल की तुलना में यह परत सामान्य रूप से अदृश्य रहती है, परन्तु पूर्ण सूर्य की स्थिति में प्रकाश मण्डल से आने वाला प्रकाश चन्द्रमा से रूक जाता हैं तब कोरोना परत चमकदार दिखाई देने लगती हैं।