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RakhiSoni
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न्याय में देरी, न्यायाधीशों के रिक्त पद अथवा महंगे न्याय से जनता में न्यायपालिका के प्रति अविश्वास पैदा होता हो तो वह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।
सर्वोच्च न्यायालय के चार न्यायाधीशों के उठाए मुद्दों का सोमवार को भी कोई समाधान सामने नहीं आया। यद्यपि अटार्नी जनरल ऑफ इंडिया के के वेणुगोपाल और बार काउन्सिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष मनन मिश्रा का दावा है कि सारा विवाद सुलझ गया। इसके लिए हर सोमवार की तरह चर्चा हुई। सभी जजों की चाय पर मीटिंग के होने का जिक्र भी किया गया। खबरें यह भी आ रही हैं कि, इस बैठक में जजों के बीच कहा-सुनी हुई।
सच क्या है, यह बैठक में मौजूद जज ही बता सकते हैं लेकिन आवश्यकता इस बात की है कि, यह विवाद जल्द से जल्द सुलझे और मुख्य न्यायाधीश अथवा वे चारों न्यायाधीश अथवा पांचों मिलकर देश की जनता को इसकी सूचना दें। बेशक अटार्नी जनरल की अपनी एक हैसियत होती है लेकिन उन्हें केन्द्र सरकार का ही प्रतिनिधि माना जाता है। बार काउंसिल ऑफ इंडिया के अध्यक्ष की स्थिति मध्यस्थ की है। तब उनका बोलना उतना ही माना जाएगा। विवाद का लम्बा खिंचना किसी के हित में नहीं। न देश के , न न्यायपालिका के और ना ही लोकतंत्र के। यदि विवाद सुलझने की सूचना उचित माध्यमों से जनता के बीच नहीं जाती है तो डर यह भी रहेगा कि, वह उच्च न्यायालयों और नीचे की अदालतों तक भी पहुंचे। महाराष्ट्र में सीबीआई कोर्ट के जज रहे बी एच लोया के मृत्यु प्रकरण में उनके पुत्र और पिता सहित चाचा के बयानों ने भी इस बात को हवा दी है कि, यह प्रकरण भी चार जजों की नाराजगी का एक मुद्दा है। यह सही है कि, भारतीय न्यायपालिका के इतिहास में ऐसा मौका पहले नहीं आया लेकिन तब यह भी मानना चाहिए कि, सब कुछ ठीक नहीं है। लोकतंत्र में जनधारणा सबसे बड़ा होता है। यदि न्याय मिलने में देरी होने, न्यायाधीशों के पद रिक्त होने अथवा न्याय के महंगा होने से जनता में न्यायपालिका के प्रति अविश्वास पैदा होता है तो वह लोकतंत्र के लिए अच्छा नहीं है।