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AbhilekhPratapSingh
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किसी जमाने में एक चोर था। वह बड़ा ही चतुर था। एक दिन उस चोर ने सोचा कि जब तक वह राजधानी में नहीं जायेगा और अपना कोई करतब नहीं दिखाएगा, तब तक चोरों के बीच उसकी धाक नहीं जमेगी। ऐसा सोच वह राजधानी चला गया और जाते ही पूरे नगर का चक्कर लगाया। उसने तय किया कि राजा के महल से वह अपना काम शुरू करेगा। राजा ने रात दिन महल की रखवाली के लिए बहुत से सिपाही तैनात कर रखे थे। पकड़े गए परिन्दा भी महल में नहीं घुस सकता था। महल में एक बहुत बड़ी घड़ी भी लगी थी जो पूरे दिन के हर घंटे पर बजती थी। इसी घड़ी की मदद से चोर ने राजा के महल में घुसने की तरकीब निकाली। उसने लोहे की कुछ कीलें लीं और जब रात को घड़ी ने बारह बजाये तो घंटे की हर आवाज के साथ वह महल की दीवार में एक-एक कील ठोकता गया। इस तरह बिना शोर किये उसने दीवार में बारह कीले लगा दी। फिर उन्हें पकड़-पकड़कर वह उपर चढ़ गया और महल में दाखिल हो गया। इसके बाद उसने महल में से बहुत से हीरे चुरा लिए। अगले दिन जब चोरी का पता लगा तो राजा ने अपने मंत्रियों को आदेश दिया कि शहर की सड़को पर गश्त् करने के लिए सिपाहिंयो की संख्या दोगुनी कर दी यह भी कहा गया कि अगर कोई भी रात को घुमता हुआ पाया गया तो उसे चोर समझकर पकड़ लिया जाएगा। जिस समय दरबार में यह ऐलान हो रहा था। एक नागरिक के भेष में चोर मौजूद था। उसे सारी योजना पता चल गई। उसे यह भी मालूम हो गया कि वह कौन-से छब्बीस सिपाहीं हैं जिन्हें गश्त् के लिए चूना गया हैं। तभी उसने साधु का रूप धारण किया और उन सभी सिपाहिंयों की बीवियों से जाकर मिला। उनमें से हर एक महिला इस बात के लिए उत्सुक थी। कि उसका पति ही चोर को पकड़़े और राजा से इनाम ले। उसमें एक-एक करके सभी औरतों से कहा कि उसके पति की पोशाक में चोर उसके घर आयेगा।