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AbhilekhPratapSingh


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अच्‍छा हुआ कि कांग्रेस ने सुप्रीम कोर्ट के मुख्‍य न्‍यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्‍ताव लाने की माकपानेता सीताराम येचुरी की सनसनीखेज पहल से खुद को दूर रखने के संकेत दिए। जब सुप्रीम कोर्ट के चार वरिष्‍ठ न्‍यायाधीशों और मुख्‍य न्‍यायाधीश के बीच मतभेद के मूल कारण अभी तक स्‍पष्‍ट नहीं और दोनोें पक्ष अपने स्‍तर पर मामला सुलझाने की बात कर रहे हैं तब किसी भी राजनैतिक दल के लिए यह ठीक नहीं कि वह न्‍यायाधीशोें के विवाद में कूदे यह सही है कि प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करने वाली सुप्रीम कोर्ट के चार न्‍यायाधीशों ने मुख्‍य न्‍यायाधीश के तौर तरीकों पर अपनी अपत्ति दर्ज कराईं थी, लेकिन इसकी अनदेखी नहीं की जा सकती कि एक तो खुद उन्‍होंने सारी बातें सार्वजनिक करने से इनकार किया और दूसरे, उनमें से एक न्‍यायाधीश ने साफ तौर पर यह कहा कि अन्‍य किसी को बीच में पड़ने की जरूरत नहीं है। एक तथ्‍य यह भी है कि चारों न्‍यायाधीशों और मुख्‍य न्‍यायाधीश के बीच मतभेद के कारणों की तह तक पहुंचें बिना इस नतीजे पर पहुंचना कठिन है कि कौन सा पक्ष कितना सही है? आखिर इन हालात में मुख्‍य न्‍यायाधीश के खिलाफ महाभियोग प्रस्‍ताव लाने की जरूरत जताकर सीताराम येचुरी स्‍वयंभू न्‍यायाधीश बनने की कोशिश क्‍यों कर रहे हैं? उन्‍हें यह स्‍पष्‍ट करना चाहिए कि वह किस आधार पर इस नतीजे पर पहुंच गए कि जजों के विवाद में सारा दोष मुख्‍य न्‍यायाधीश का है और वह भी इस हद तक कि उनके खिलाफ महाभियोग प्रस्‍ताव लाया जा सकता है? एक ऐसे समय जब चार न्‍यायाधीशों की ओर से प्रेस कॉन्‍फ्रेंस करने से सुप्रीम कोर्ट के साख पहले से ही सवालों के घेरे में है तब मुख्‍य न्‍यायाधीश के खिलाफ महाभियोग लाने की कोशिश इस संस्‍था की साख को और गिरने का ही काम करेंगी। संसद के किसी भी सदन का सदस्‍य होने के बावजूद सीताराम येचुरी ने जिस तरह महाभियोग का शोशा उछाला उसके पीछे छुद्र राजनीति इसलिए भी दिख रही है, क्‍योंकि सभी को प‍ता है कि प्रेस कॉन्‍फ्रेंस की अगुआई करने वाले न्‍यायाधीश से मुलाकात करने का उतावलापन भाकपा सांसद डी राजा ने दिखाया था।
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