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mukeshkumar1449468
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महोदय, यह जीवन समस्याओं से भरा हुआ है सभी सुखमय जीवन की कामना करते है, बस भावना सीमित हैं सभी अपने परिवार तक सीमित है, पहले लोग देश की बात करते थे, फिर प्रदेश, जिला कस्बा, गाँव परिवार रिश्तेदार की बात करते थे। अब यह क्रम ठीक नहीे है पहले स्वयं फिर परिवार, रिश्तेदार, गाँव, शहर, जिला, प्रदेश और धर्म की परवाह करते है। यह क्रम ठीक नही है आज 90 फीसदी लोग झगड़े, जातिवाद, धर्मवाद,क्षेत्रवाद पर आधारित होते हैं, अब तो राजनीति केवल वाद पर अधिपत्य जमाये हुए है। अभी हाल के चुनावों मे हुये टिकट वितरण मे खुलेआम मतदाताओं के प्रतिशत के आधार पर टिकिट वितरित किये गये राजनिति देश के हित के लिये ठीक नही है जब उम्मीदवार जातिगत आधार पर जीतना चाहेगा तो वह किस प्रकार से देश का, दल का, राज्य का हित सोचेगा जब उसकी सोच का दायर ही सीमित है तो फिर आप स्यमं तय कर लें कि वह क्या करेगा। अत: मेरा निवेदन है कि जातिगत व दलगत राजनीति से ऊपर उठकर देश क बारे मे सोचे तभी देश विकाश के पथ पर अग्रसर होगा एवंं लोग सुखमय जीवन व्यतीत कर पायेगे।
श्री मान, यह पहला अवसर है जबकि चुनाव के पुर्व टिकिट वितरण मे ही जनता दल के मतभेद सामने आ गये है। या फिर यह कहना उचित होगा कि सीमेन्ट सुखने के पुर्व ही महल में दरार आ गयी है।जो लोग टिकिट की खीचतान कर रहे है उनमें से एक उम्मीदवार अब भरतीय जनता पार्टी मे शामिल हो गया है औीर शेष हताश नजर आ रहे है कुछ लोग तो यह कहते भी सुने गये है कि अब हार तो निश्चित ही है परन्तु एेसे वक्त में पैसा खर्च किया जाये या नही।
दल के राष्ट्रीय अध्यक्ष कोष से प्रत्येक उम्मीदवार का अभी छ: लाख रूपये प्रदान किया गया है जबकि एेसी आशा की जाती है कि दो लाख रूपया और प्रत्येक उम्मीदवार को दिया जा सकता है, इस प्रकार कुल खर्चे का 50% हिस्सा पाटी ही वहन करेगी शेष खर्चा यदि उम्मीदवार चाहे तो अपनी जेब से खर्च करें पर कौन चाहेगा कि हार की स्थिति में पैसा बर्बाद हो अत: समझदारी इसी में है कि पार्टी के पैसों पर चुनाव लड़ा जाए तकि अपना नाम भी हो सके और घर की जमा पूजी पर भी आँच न आने पावे। रही बात पार्टी की तो यह तो विभाजन के वक्त ही तय हो गया था कि अब पार्टी सर्वनाश की दिशा में अग्रसर हो रही है। और पार्टी के नेता इसको बचाने मे पुर्णतया असफल हो गये है।