words per minute
27
ROYALHAANS
00:00
Speed
मनुष्य को ज्ञान इसलिए चाहिए कि वब अपनी वृद्धि का उचित उपयोग कर किसी नदी की तरह आगे की ओर प्रवाहित हो। विवेक भी इसलिए चाहिए कि वह जीवन की धारा को संयमित और अनुशासित करे। भारत में सरस्वती की कल्पना सबसे पहले ऋग्वेद में पवित्र नदीं के रुप में की गई है, जो धीरे-धीरे नदी देवता और वाग् देवता की रूप में परिणत हूई। यह सरस्वती अत्यंत वेगवती नदी मानी गईहै। ऋग्वेद ने उसे देवी के रूप में प्रतिष्ठित किया, जो हमें पवित्रता, ज्ञान और शक्ति प्रदान करती है। नदी देवता का वाग् देवता के रूप में बदलाव यह बताता है कि हमें बहना भी है और कहना भी। यही वाणी विधा और कला के रूप मे स्वीकार की गई है। सरस्वती का वाहन हंस है, जो दूध का दूध और पानी का पानी कर दैता है। इसे ही न्यायशास्त्र में नीरक्षीर न्याय कहते है।
सरस्वती का आवाहन बसंत पंचमी के दिन होता है। कहते हैं, सी दिन बसंत का आगमन होता है। सूखे पत्ते रहे होने लगते हैं। वन-वाटिकाएं नई कलीयों से भर जाती हैं। सब ओर सुगंध की एक लहर दौड़ जाती है। बसंत क जागरण है, भीतर से बाहर प्रस्फुटित होने का भावप, शीत और कुहासे को चीरकर निकलती हुई सुर्यजकिरणों की ऊष्मा का अनुभव। मौसम बदलने के साथ ही हमारे मव में भी बदलाव आ जाता है, जो हमें बताता हे कि जीवन हम इस तरह जिएं कि हमारा प्रवाह कभी शिथिल न हो और उसमें संयम बना रहे।
यह सरस्वती बहने के साथ-साथ वाणी का संयम भी सिखाती है। निगला के शब्दों में यही सरस्वती हमें नव गति, नव लय, ताल छंद नव प्रदान करती है और हम इस ज्योतिर्मय निर्झर में नहाकर नए हो जाते हैं।
रोहिंग्या बच्चों को बचाएं
हम यह जानकर काफी हैरान हैं कि बांग्लादेश में रोहिंग्या लोगों के लिए गठित शरणार्थी शिविरों में रह रहे तीन लाख बच्चों में से 40,000 बच्चे यतीम हैं। इन वदनसीब बच्चों ने म्यांमार के रखाईन सूबे में रोहिंग्या समुदाय के बर्बर दमन के दौरान अपने मां-बाप में से किसी एक को खो दिया या फिर दोनों का साया उनके सिर से उठ गया। इस दमन से छह लाख रोहिंग्या लोगों को इपना घर-बार और वतन छोड़ भागकर बांग्लादेश में शरण लेनी पड़ी। किन त्रासद स्थितियों से इन बच्चों को गुजरना पड़ा जिस दर्द को वे आज भी जी रहे हैं, उसकी की भी कल्पना कर सकता है। उनके भविष्य के आगे अनिश्चितता पसरी हुई है। इन बेसहारा बच्चों की मदद के लिए क्या कुछ किया जा सकता है? इनमें से ज्यादातर बच्चे जबर्दस्त कुपोषण के शिकार हैं, सलिए बीमारी के लिहाज से भी ये बेहद संवेदगनशील हैं। सेव द चिल्ड्रेन संगठन ने अपने आकलन में पाया है कि इस साल 48,000 और शिशुओं का जन्म इन गंदे शिविरों में होगा। आखिर ये नवजात कैसे जीवित रह पाएंगे? यह सचमुच दिल दहलाने वाली बात है कि यूनीसेफ के सहयोग से देश के समाज-कल्याण मंत्रालयों ने 17.22 करोड़ टके की एक योजना शुरू की है, जिससे 9,000 यतीमों की माली मदद की जाएगी। इस योजना में 90 बाल संरक्षण समितियां होंगी, जो करीब 34,000 बच्चों की निगरानी करेंगी। योजना के तहत सक्रिय केंद्र बच्चों को बाल-तस्करी के बारे में तो जागरूक करंगे ही, हिंसक घटनाओं से भी उनका संरक्षण करेंगे। पर जिस बड़ी तादाद में रोहिंग्या बच्चे यतीम की श्रेणी में आ रहे हैं, उसे देखते हुए इस प्रोजेक्ट को विस्तार देने की आवश्यकता है। यहां हम अपनी हुकूमत को उसकी भूमिका और जिम्मेदारी का एहसास कराने के साथ-साथ विश्व बिरादरी से भी अपील करेंगे कि वे न सिर्फ इन लावारिस बच्चों के लिए, बल्कि इन शिविरों में रह रहे सभी मासूमों के कल्याण के लिए ठोस योजना के साथ फौरन आगे जाएं। यह हम सबकी नैतिक जिम्मेदारी है कि हम इन बच्चों को भूख, बीमारी, हिंसा और मानव तस्करी से बचाएं।