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Dilip_Shah


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पसभापति महोदय, हमारे देश के सामने और सारे विश्‍व के सामने जो प्रमुख समस्‍याएं हैं, जैसे - बेकारी, बेरोजगारी, जनवृद्धि, भ्रष्‍टाचार एवं आतंकवाद इनसे निपटने के लिए जो योजनाएं बनाई जाती है और योजनाओं के माध्‍यम से समस्‍याओं को कम करके या दूर करने का प्रयास किया जाता है। परन्‍तु आतंकवाद एक ऐसी समस्‍या है जो सारे विश्‍व में एक साथ जन्‍म ले रही है, देश में उपजे आतंक को सरकार पुलिस आतंक से दबाने का प्रयास करती है, नतीजा यह होता है कि आतंकवाद दुबारा जन्‍म लेता है तो पुरानी से दुगनी ताकत लेकर उभरता है। यही नहीं जब आतंकवाद को दबाया गया था, उस समय पुलिस या सेना द्वारा प्रयुक्‍त साधनों का भरसक प्रयत्‍न किया जाता है। आपको और मुझे इस बात की शर्म होनी चाहिये कि देश के लोग इन आतंकी ताकतों को शरण देते हैं और जन-हानि एवं राष्‍ट्र-हानि कराते हैं। मेरा मानना यह भी है कि आज के समय में लोगों को वह शिक्षा नहीं दी जाती जिससे लोगों में राष्‍ट्र-प्रेम की भावना जागृत हो और उनकी समझ में सके कि यह राष्‍ट्र हमारा है, तथा इस राष्‍ट्र की सम्‍पत्ति हमारी संपत्ति है। आप स्‍वयं विचार कीजिये कि यह हालत क्‍यों हुई। आप महसूस करेंगे कि लोगों ने हमारे राष्‍ट्र में राष्‍ट्रीयता के बीज बोकर मतभेदों के बीज बोये हैं। कोई भी दल हार जाता है वह यह नहीं कहता कि अमुक राष्‍ट्र हमारा है, एवं यह सरकार हमारी है, वह तो केवल सरकार विरोधी नीतियों में लगा रहता है, और सरकार एवं राष्‍ट्र को लगातार क्षति पहुंचाता रहता है, उसे तनिक भी महसूस नहीं होता कि हम अपने देश का नुकसान कर रहे हैं। आप दलों के लिये आचार संहिता की बात करते हैं, आचार संहिता केवल चुनाव तक ही लागू रहती है परन्‍तु चुनाव के बाद आचार संहिता लागू नहीं होती जिसके परिणामस्‍वरूप आतंकवाद पुन: अपने पैर पसार लेता है।
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