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IndreshkumarMaurya
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मोटर वाहनों से होने वाले प्रदूषण को रोकने के लिए सार्वजनिक परिवहन प्रणाली का विकास करने की कोई दूरदर्शी योजना नहीं बनाई गई और आॅड इवन जैसे दिखाऊ उपाय अपनाने का प्रयास किया गया, जिनके बारे में यह भी सुनिश्चित नहीं है कि इनसे प्रदूषण कम होता है या नहीं। ओखला, गाजीपुर और भलस्वा लैंडफिल साइट्स पर कचरे के पहाड़, इनके कारण होने वाली दुर्घटनाएं और इनमें लगने वाली आग के द्वारा फैलता प्रदूषण हमारे ठोस कचरा प्रबंधन की असफलता को बयान करते हैं। स्थिति यह है कि दिल्ली में लोगों की संभावित आयु में से 6.3 वर्ष वायु प्रदूषण के कारण कम हो जाते हैं, जबकि पूरे देश के लिए यह आंकड़ा 3.4 वर्ष का है। दिल्ली के हर तीसरे बच्चे का फेफड़ा वायु प्रदूषण के कारण खराब हो चुका है। सुबह की सैर और खुले में खेले जाने वाले खेल भी अब दिल्ली के लोगों के लिए खतरनाक बन गए हैं।
राष्ट्रीय स्तर पर स्थिति कम भयावह नहीं है। देश के पैंतालीस प्रतिशत जिलों में निवास करने वाली पचास प्रतिशत आबादी पीएम 2.5 के घातक स्तर वाली वायु में सांस लेने के लिए विवश है। दिल्ली और अन्य महानगरों के प्रदूषण के बारे में तो देश और विश्व का मीडिया चर्चा करता रहता है लेकिन छत्तीसगढ़, झारखंड, ओड़िशा और मध्यप्रदेश के वनांचल- जहां कोयला खनन तथा बिजली उत्पादन व इस्पात उद्योग के कारण प्रदूषण चरम पर है- अचर्चित रह जाते हैं। इन क्षेत्रों में स्थानीय राजनीतिकों, अधिकारियों, माफियाओं और उद्योगपतियों का घातक गठजोड़ पर्यावरण मानकों की धज्जियां उड़ाते हुए पर्यावरण के अंधाधुंध दोहन में लगा हुआ है। अनेक ऐसे दस्तावेजी साक्ष्य मौजूद हैं कि पर्यावरणीय प्रभाव आकलन रिपोर्ट (एनवायरनमेंट इम्पैक्ट असेसमेंट रिपोर्ट) में किस प्रकार हजारों हेक्टेयर में फैले वनों, वन्य पशुओं और ऐतिहासिक धरोहरों को गायब करने की सफल-असफल चेष्टा की गई है।
किस प्रकार पर्यावरणीय रक्षा की।