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SandeepUpadhyay2568
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यहां यह भी समझ लेना होगा कि स्पेसएक्स एक निजी कंपनी है। यह अमेरिका के नासा की तरह या हमारे इसरो की तरह या फिर रूस के रॉसकॉस्मॉस की तरह की अंतरिक्ष एजेंसी नहीं है, जो सार्वजनिक धन से चलती हैं। उन्हें न बाजार साख की जरूरत होती है, न निजी निवेश की और न ही इन सबके लिए विज्ञापनों की। स्पेसएक्स के दो मकसद हैं, (जाहिर है, निजी क्षेत्र की कंपनी होने के कारण पैसा कमाने के अलावा) एक तो अंतरिक्ष यात्राओं को सस्ता बनाना, और दूसरा व सबसे प्रमुख मंगल ग्रह पर मानव बस्ती बसाना। जाहिर है कि पहला मकसद दूसरे का ही विस्तार है, क्योंकि मंगल ग्रह पर बस्ती आप तभी बसा सकते हैं, जब अंतरिक्ष में आना-जाना आसान और सस्ता हो। स्पेसएक्स इससे पहले नासा के स्पेस शटल की तरह ही यान को अंतरिक्ष में भेजने और फिर सकुशल धरती पर वापस ले आने के सफल परीक्षण कर चुका है। फॉल्कन हेवी की उड़ान इसी दिशा में अगला कदम है।
यह उड़ान विज्ञान और कारोबार जगत के बदलते समीकरणों की कहानी भी कहती है। अभी तक असंभव से दिखने वाले दूरगामी लक्ष्य सरकारी एजेंसियों के हवाले होते थे, जिसमें जनता की कमाई का पैसा यह सोचकर लगाया जाता था कि ये आखिर में जन-कल्याण करेंगी। निजी क्षेत्र ऐसे जोखिम से बचता ही था। स्पेसएक्स की सफलता बताती है कि यह सब बदलने लगा है। अब असंभव अभियानों में लगी कंपनियां न सिर्फ तेजी से काम को अंजाम दे रही हैं, बल्कि निवेशक उनमें भरोसा भी जता रहे हैं और पैसा भी लगा रहे हैं। वह भी तब, जब यह तय नहीं है कि सफलता कब मिलेगी और कितनी मिलेगी? मिलेगी भी या नहीं मिलेगी। स्पेसएक्स ऐसी अकेली कंपनी नहीं है। तकरीबन आधा दर्जन कंपनियां ऐसी ही परियोजनाएं लेकर बाजार में आ चुकी हैं। बेशक अभी वे उतना आगे नहीं, जितना स्पेसएक्स जा चुकी है।