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hemantrathore
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इससे यह धारणा खारिज होती है कि धनी भारतीय व्यवसायी चैरिटेबल नहीं हैं- जब वे पैसे देते भी हैं तो मंदिर में ईश्वर को खुश करने के लिए। हमें यह याद रखना होगा कि 1991 में 97 फीसदी टैक्स रेट वाला 'लाइसेंस राज' जाने के बाद भारतीयों ने गंभीरता से संपदा इकट्टा करना शुरू किया। आमतौर पर पहली पीढ़ी पैसा कमाती है और दूसरी उसका दिखावा करती है जैसे लक्ष्मी मित्तल ने फ्रांस में अपनी बेटी की मशहूर शादी के अवसर पर किया। दूसरी पीढ़ी को पैसे की नहीं, सत्ता की कामना होती है, इसीलिए केनेडी और रॉकफेलर राजनीति में आए। पैसे तथा सत्ता में जन्मी तीसरी पीढ़ी सम्मान चाहती है और खुद को परोपकार तथा कलाओं के प्रति समर्पित कर देती है। 19वीं और 20वीं सदी की शुरुआत में अमेरिका के 'रॉबर बैरॉन युग' (अनैतिक व एकाधिकार वादी तरीकों से खूब पैसा इकट्ठा करने वाले और जबर्दस्त राजनीतिक प्रभाव वाले बिज़नेसमैन) में भी स्टील किंग एंड्रयू कारनेगी ने अपनी 90 फीसदी संपत्ति अमेरिकी शहरों में सार्वजनिक लाइब्ररी स्थापित करने के लिए दे दी। उनका यह कथन मशहूर है, 'जो धनी होकर मरता है, वह अपमानित हाेकर मरता है।' जिस तरह ज्ञान आधारित अर्थव्यवस्था में संपदा उत्पन्न करने का चक्र छोटा हो गया है, चक फीनी से प्रेरित बिल गेट्स ने ती पीढ़ियों का चक्र तोड़ दिया और अपने ही जीवन में पैसा दे दिया।
वारेन बफे ने भी यही किया। गेट्स अपने 'गिविंग प्लेज' से दुनियाभर के युवा आंत्रप्रेन्योर को अपने ही जीवनकाल में आधी संपत्ति देने के लिए प्रेशर कर रहे हैं। उन्होंने अजीम प्रेमजी, नंदन नीलेकणि, शिव नादर, सुनील मित्तल, आशीष धवन और कई उदार लोगों को प्रेशर किया है। धवन के मामले में इसका नतीजा विश्वस्तरीय लिबरल आर्ट्स यूनविर्सिटी की रचना में हुआ, जिसके उनकी जैसी सोच वाले कई संस्थापक हैं। यदि आपको अशोका में प्रवेश मिल जाए तो आपको किसी अज्ञात दानदाता से स्कॉलरशिप मिलना तय है। नादर भी विश्वस्तरीय संग्रहालय बना रहे हैं। पंचतंत्र की शुरुआत में ही एक बहुत अच्छी कहानी है जो बताती है कि एक अधिक उम्र का व्यापारी युवा व्यापारी को सलाह देता है कि सफल जीवन के लिए चार हुनर चाहिए। एक, वह कहता है तुम्हें पैसा कमाना सीखना चाहिए। दो, फिर इसे संरक्षित रखना सीखना होगा इससे कालीन के नीचे छिपाइए मत बल्कि इस पर ब्याज कमाकर इसे बढ़ाइए। तीन, तुम्हें मालूम होना चाहिए कि इसे कैसेट खर्च करें कंजूस न बनें तो शाहखर्च होने से सभी बचें। अाखिर में, इसे देना सीखोे।