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ManishTiwari1554775
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जो व्यक्ति भीतर से परिपूर्ण हो, उसे प्रदर्शन की कोई आवश्यकता नहीं होती। जो संतुष्ट है, प्रसन्न है, उसे किसी को बताने की जरूरत नहीं पड़ती कि वह खुश है। बताने की जरूरत उसे पड़ती है जो भीतर से खाली हो। जिसके भीतर अभाव है, जो मरूभूमि से समान है, जिसका मन कुरूपता से भरा है, वह बाहर की सुंदरता को ओढ़कर यह बताने का प्रयास करता है कि मैं भरा हुआ हूं, सुंदर हूं। वस्त्र दो क्षण के लिए सुंदर दिखने का आभास करा सकता है, सुंदर नहीं बना सकता। हमारे देश में संत, महात्मा खुले बदन रहते हैं, लंगोटी पहने रहते हैं, लेकिन उनके चेहरे पर जो अपार शांति है, वह कीमती वस्त्र और आभूषण पहने हुए लोगों के चेहरे पर नहीं होती है। वहां
उनके चेहरे पर कोई गहरी खाई, गहरा सन्नाटा दिखाई नहीं पड़ता। कोई पुराना खंडहर, किसी अतीत की कहानी, उनके चेहरे पर दिखाई नहीं पड़ती। तभी तो करोड़ों रूपये के जेवरात पहनकर लाखों लोग इस नंगे बाबा के सामने हाथ जोड़े खड़े हैं। सच कहा जाए, तो जो भी लोग बाहर को संसार में सुख खोजते हैं, उन्हें बाहर दुख ही मिलता है। बाहर केवल दुख है, कहीं कोई सुखी नहीं है। बाहर कराहते हुए, छटपटाते हुए पीड़ा में रोते हुए लोग ही मिलते हैं। हमें बाहर जो चकाचौंध दिखाई पड़ती है, वह नकली है। जो रूप हमें आकर्षित कर रहा है, वह असली नहीं है।
जो भी व्यक्ति नकली चेहरा लेकर बाहर निकलता है वह कहीं न कहीं अपने मन के घावों को भरना चाहता है, अपनी पीड़ा को छिपाना चाहता है। जिस व्यक्ति का मन खाली रहता है, वह अपना खालीपन किसी को दिखाना नहीं चाहता। इसलिए जब भी वह घर से बाहर निकलता है तो रंग बिरंगे कपड़े पहनकर निकलता है ताकि लोग उसे देखें, उसे देखकर कोई यह न कहे कि यह गरीब है। यही कारण है कि प्रत्येक व्यक्ति बाहर जाने के लिए अपना विशेष कपड़ा रखता है। घर में वही व्यक्ति दूसरा बन जाता है। महिलाओं में श्रृंगार करने की प्राचीन परंपरा रही है और शास्त्रों में भी कहा गया है कि सोलह प्रकार के श्रृंगार होते हैं। पुरूष के लिए यह सुविधा नहीं है। शायद यही कारण है कि पुरूष भी अब महिलाओं की तरह श्रृंगार करके अपनी कमी छिपाना चाहता है। हमारे घर की महिलाएं बाहर जाते समय काफी अच्छी तरह से श्रृंगार करके अपनी कमी को छिपाना चाहता है। हमारे घर की महिलाएं बाहर जाते समय काफी अच्छी तरह से श्रृंगार करती हैं, अच्छे वस्त्र पहनती हैं, ताकि लोगों का ध्यान उनकी ओर मुड़ सके।