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ManishTiwari1554775
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रंग बदलता मौसम, सुभाष नीरव पिछले कई दिनों से दिल्ली में भीषण गरमी पड़ रही थी लेकिन आज मौसम अचानक खुशनुमा हो उठा था। प्रातः से ही रूक-रूक कर हल्की बूंदाबांदी हो रही थी। आकाश काले बादलों से ढका हुआ था। धूप का कहीं नामोनिशान नहीं था। मैं बहुत खुश था। सुहावना और खुशनुमा मौसम मेरी इस खुशी का एक छोटा सा कारण तो था लेकिन बड़ा और असली कारण कुछ और था। आज रंजना दिल्ली आ रही थी और मुझे पुराने दिल्ली स्टेशन पर रिसीव करने जाना था। इस खुशगवार मौसम में रंजना के साथ कल्पना ने मुझे भीतर तक रोमांचित किया हुआ था। हल्की बूंदाबांदी के बावजूद मैं स्टेशन पर समय से पहले पहुंच गया था। रंजना देहरादून से जिस गाड़ी से आ रही थी, वह अपने निर्धारित समय से चालीस मिनट देर से चल रही थी। गाड़ी का लेट होना मेरे अंदर खीझ पैदा कर रहा था लेकिन रंजना की यादों ने इस पैंतालीस मिनट के अन्तराल का अहसास नहीं होने दिया। परसों जब दफ्तर में रंजना का फोन आया तो सिर से पांव तक मेरे शरीर में खुशी और आनन्द की मिली जुली एक लहर दौड़ गई थी। फोन पर उसने बताया था कि वह इस रविवार को मसूरी एक्सप्रेस से दिल्ली आ रही है और उसे उसी दिन शाम चार बजे की रेल से कानपुर जाना है। बीच का समय वह मेरे साथ गुजारना चाहती थी। उसने पूछा था- क्या तुम आओगे स्टेशन पर? कैसी बात करती हो रंजना! तुम बुलाओ और मैं न आऊं, यह कैसे हो सकता है? मैं स्टेशन पर तुम्हारी प्रतीक्षा करता हुआ खड़ा मिलंगा। फोन पर रंजना से बात होने के बाद मैं जैसे हवा में उड़ने लगा था। बीच का एक दिन मुझसे काटना कठिन हो गया था। शनिवार की रात बिस्तर पर करवटें बदलते ही बीती। करीब चारेक बरस पहले मेरी पहली मुलाकात रंजना से दिल्ली में हुई थी- एक परीक्षा केन्द्र पर।