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ManishTiwari1554775
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देश मे हर मिनट कहीं न कहीं कोई सड़क हादसा होता है।। पिछले वर्ष इन हादसों में कुल एक लाख पैंतालीस हजार लोगों की जान चली गयी और पांच लाख के करीब लोग घायल हुए। मारे गए हर दस में से पांच लोगों की उम्र 15 वर्ष से 34 वर्ष के बीच थी। दूसरे शब्दों में कहें, तो यह युवा सपनों की मौत है। ये आंकड़े बताते हैं कि युद्ध, आतंकवाद या माओवादी हिंसा की तुलना में अधिक लोग सड़क हादसों में मारे गए हैं।
सड़क सुरक्षा व्यवस्था में इतनी खामियां हैं कि सड़क पर चलने वाले भयभीत रहते हैं। लिहाजा वाहनों के बंपर पर नींबू और मिर्च लटकी नजर आती है, डैशबोर्ड में देवता विराजे हैं और इगनिशन शुरू करने से पहले भगवान का नाम बुदबुदाना आम है। भारत में जहां, कर्म की गत्यात्मकता आस्था का मामला है और यात्राएं भगवान भरोसे होती हैं।हादसों की वजह से जानें जाती हैं और परिवार बिखर जाते हैं। इनमें ड्राइवर की गलती, तकनीकी गड़बड़ी, पैदल चलने वालों की गलतियां, खराब सड़कें, खराब मौसम, वाहनों की बढ़ती संख्या, बढ़ती आबादी और बेतरतीब ट्रैफिक आदि प्रमुख हैं। सड़क दुर्घटनाओं के लिए कोई एक कारण बताना संभव नहीं है।’
एक नया विधेयक राष्ट्रीय सड़क परिवहन और सुरक्षा विधेयक, 2014 तैयार किया गया। इस विधेयक में चार ‘ई’ पर जोर दिया गया, एजुकेशन, एनफोर्समेंट, इंजीनियरिंग (सड़क और वाहनों से सम्बन्धित) तथा इमरजेंसी केयर। मार्च, 2016 में पी राधाकृष्णन ने संसद को बताया कि यह विधेयक अभी भी मशविरे के स्तर पर है। उन्होंने निहित स्वार्थों पर आरोप लगाया।