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ManishTiwari1554775
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ऐसी सूचनाओं से देश को शायद ही संतुष्टि मिले कि जम्मू-कश्मीर में लगातार हो रहे आतंकी हमलों को लेकर पाकिस्तान को सबक सिखाने पर गंभीर मंथन शुरू हो गया है। आखिर ऐसा कोई मंथन तुंजवां में सेना के ठिकाने पर हमले के पहले क्यों नहीं किया गया- और वह भी तब जब ऐसे हमलों के साथ संघर्ष विराम के उललंघन का सिलसिला एक अर्से से कायम है? यह पाकिस्तान और उसके पाले-पोसे आतंकियों के दुस्साहस की पराकाष्ठा ही है कि जम्मू के सुंजवां में सेना की कार्रवाई समाप्त होने के पहले ही श्रीनगर में सीआरपीएफ के शिविर को निशाना बनाने की कोशिश की गई। तीन दिन के अँदर सुरक्षा बलों के दो ठिकानों को निशाना बनाया जाना यही बताता है कि जैश और लश्कर सरीखे आतंकी संगठनों के जरिये पाकिस्तान ने अपने छद्दम युद्ध को तेज कर दिया है। यह छद्दम युद्ध वास्तविक युद्ध से इसलिए कहीं घातक है, क्योंकि इसका कोई नियम नहीं। पाकिस्तान की ओर से जम्मू एवं कश्मीर में थोपे गए इस छद्म युद्ध का प्रतिकार तब तक संभव नहीं जब उसे इसकी बड़ी कीमत न चुकानी पड़े। यह ठीक नहीं कि भारत एक लंबे समय से पाकिस्तानी की आतंकी गतिविधियों पर प्रतिक्रिया देने में लगा हुआ है। आतंकी हमलों के बाद सेना एवं सुरक्षा बलों की खुली छूट देना हो या फिर संघर्ष विराम उल्लंघन के बाद की जाने वाली जवाबी कार्रवाई- ये एक तरह की प्रतिक्रियाएं ही कही जाएंगी। पाकिस्तान जब कुछ अनुचित करे तब उसके खिलाफ कोई कदम उठाने की नीति ने भारत को एक तरह से प्रतिक्रिया देने तक सीमित कर दिया है। न जाने कब से इसकी जरूरत जताई जा रही है कि पाकिस्तान के शैतानी इरादों को भांपकर उसके खिलाफ ऐसी गहन कार्रवाई की जाए जिससे वह भारत के खिलाफ कुछ करने से पहले न केवल हिचके, बल्कि सौ बार सोचे भी।