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ashishMishra1541554
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सुप्रीम कोर्ट ने यह आदेश देकर चुनाव सुधारों को बल देने का ही काम किया है कि अब प्रत्याशियों को नामांकन के वक्त अपने साथ-साथ जीवनसाथी एवं समस्त आश्रितों की आय के स्रोत का भी विवरण देना होगा। यह आदेश इसलिए महत्वपूर्ण है, क्योंकि अभी तक उन्हें केवल अपनी चल-अचल संपत्ति का ही विवरण देना होता था। यह आदेश ऐसे समय आया है जब कुछ सांसदों और विधायकों की संपत्ति में बेतहाशा वृद्धि के चलते उनकी जांच हो रही है। इसी तरह यह भी एक तथ्य है कि बीते कुछ समय से पैसे बांटकर चुनाव जीतने की प्रवृत्ति बढ़ती हुई दिखी है। उम्मीद की जाती है कि सुप्रीम कोर्ट का उक्त आदेश उन लोगों पर दबाव बनाने में सफल होगा जो भ्रष्ट तौर-तरीकों का इस्तेमाल करते हुए चुनाव लड़ते हैैं या फिर चुनाव जीतने के बाद अनुचित तरीके से पैसे बनाने में लग जाते हैैं, लेकिन महज इस आदेश के आधार पर ऐसा कुछ होने के बारे में सुनिश्चित नहीं हुआ जा सकता कि राजनीति और चुनाव में धनबल की भूमिका पूरी तौर पर खत्म होने वाली है। यह तो तब होगा जब राजनीति और चुनाव के तौर-तरीकों को और अधिक पारदर्शी बनाया जाएगा।
राजनीतिक दलों के चंदे का मामला अभी भी सही तरह से नहीं सुलझा है। इस मामले में चुनावी बांड के चलन पर खुद सरकार का मानना है कि अभी और कुछ किया जाना शेष है। यह शेष इसलिए है, क्योंकि राजनीतिक दलों के बीच चुनाव सुधारों को लेकर सहमति नहीं बन पा रही है। राजनीतिक दल भले ही लोकतंत्र के गुण गाते हों, लेकिन वे भारतीय लोकतंत्र को उन्नत एवं आदर्श बनाने के लिए कुछ ठोस करते हुए नहीं दिख रहे हैैं। यह किसी से छिपा नहीं कि वे अपने आय-व्यय का सही-सही विवरण देने के लिए तैयार नहीं।