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ारत की सभ्‍यता एवं संस्‍कृति के विषय में यह बिना किसी विवाद के स्‍वीकार किया जाता है कि वह संयुक्‍त राज्‍य अमेरिका और पश्चिमी यूरोप देशों की सभ्‍यता से बहुत पुरानी है। परन्‍तु साथ ही साथ इसमें कोई सन्‍देह नहीं है कि आर्थिक दृष्टि से भारत एक अल्‍प विकसित देश है। भारत के प्राकृतिक संसाधन सम्‍पन्‍न है और उसमें विविधता भी है, लेकिन उसका समुचित उपयोग और विनियोजन होना बाकी है। भारत एवं अंग्रेजी शासन काल में यद्यपि अर्थव्‍यवस्‍था में कुछ परिवर्तन हुए हैं, तथापि यह निश्चित रूप से कहा जा सकता है कि इस देश का आर्थिक ढांचा मूलत: अविकसित है। नगरों में आर्थिक जीवन कुछ बदला हुआ नजर आता है, परन्‍तु उसका भारत की अर्थ-व्‍यवस्‍था पर व्‍यापक प्रभाव नहीं पड़ सका है। ‘डी. के. रांगेणकर’रांगेणकर के अनुसार भारतीय अर्थव्‍यवस्‍था के स्‍वरूप का अनुमान कुछ बृहत उद्योगों अथवा बम्‍बई, कलकत्‍ता, मद्रास या दिल्‍ली के व्‍यापारिक जीवन से नहीं लगाया जा सकता। 18वीं शताब्‍दी तक भारत एक साम्राज्‍यवादी शोषण का शिकार नहीं हुआ था। इसलिये सामन्‍तीं उत्‍पादन सम्‍बन्‍धों के बावजूद भी यह देश ब्रिटिश भारत की तुलना में समृद्ध था। भारत की आर्थिके संस्‍थाएं, उत्‍पादन विधियां और तैयार वस्‍तुएं उस काल के किसी भी उन्‍नत देश की तुलना में नीचे स्तर की नहीं थी। भारत के आर्थिक विकास से प्रभावित होकर कार्ल मार्क्‍स ने लिखा था, हाथ करघों और चर्खों तथा उन पर कार्य करने वाले हजारों बुनकर तथा भारतीय जुलाहे अर्थव्‍यवस्‍था की धुरी है। सहारा संसार का सबसे बड़ा गर्म मरुस्‍थल है। वहां हजारों वर्ग किलोमीटर के ऐसे क्षेत्र हैं जहां यदा-कदा ही बारिस होती है। उसका पूर्वी क्षेत्र तो ऐसा भाग है जहां शायद तीस चालीस साल में कभी एक बार वर्षा हो जाती है।
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