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MannuAnuragi
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''सेवा मनुष्य की स्वाभाविक वृत्रि है. सेवा ही उसके जीवन का आधार है. उपन्यास सम्राट् मुंशी प्रेमचन्द्र के इस कथन का अभिप्राय युवावस्था के आगमन पर समझ में आने लगता है, जब व्यक्ति घर गृहस्थी के जंजाल में उलझने लग जाता है. वह अपनी पत्नी और संतान के लिए बहुत कुछ निस्पृह भाव से करने के लिए विवश हो जाता है- किसी बाहृा दबाव के कारण नहीं, बल्कि आन्तरिक प्रेरणा के कारण.
प्रकृति में सेवा का नियम अव्याहत गति से कार्य करता हुआ दिखाई देता है. सूर्य और चन्द्र विवश का प्रकाश एवं उष्णता प्रदान करते हैं, वायु जीवनदायक श्वास प्रदान करती है. प्रथ्वी रहने का स्थान देती है, वृक्ष छाया देते है आदि. वे ऐसा जीवन किसी प्रतिफल-प्राप्ति की भावना से नहीं करते हैं. वे केवल अपने जन्मजात स्वभाववश ऐसा करते हैं. हम भी दीन-दु:खियों की सहायता किसी आन्तरिक प्रेरणावश ही करते है. सड़क के किसी केाने में पड़े हुए घायल या बेहोश व्यक्ति को उठाकर जब अस्पताल ले जाते है, तब क्या हम सोचते हैं कि वह अच्छा होने पर हमको पुरस्कार देगा अथवा कभी हमारे घायल अथवा बेहोश हो जाने पर यह हमं अस्पताल पहुँचाएगा।