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MannuAnuragi
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अहिंसा को एक राजनीतिक स्वरूप देकर उसे हथियार बना देने वाले महात्मा गांधी के जीवन पर बना देने वाले माहात्मा गांधी के जीवन पर सर रिर्चड एटनबरो एक क्लासिक फिल्म बना चुके हैं और 'मैने गांधी को नही मारा है' जैसी फिल्में बन चुकी हें। केतन मेहता महान नेता वल्लभभाई पटेल का बायोपिक 'सरदार' के नाम से बना चुके हैं। श्याम बेनेगल भी सहारा कॉर्पोरेट के धन से सुभाषचंद्र बोस पर चार घंटे की फिल्म बना चुके हैं।
गौरतलब है कि पंडित जवाहर लाल नेहरु पर कोई बायोपिक नहीं बना है। यहां तक कि राजीव गांधी की हत्या पर भी एक अत्यंत राचक फिल्म 'मद्रास' कैफे बन चुकी है। यह दुखद है कि यह फिल्म कम दर्शक देख पाए हैं जबकि यह राजीव गांधी की हत्या पर शोधपरक दस्तावेज की तरह है। आज के हुक्मरान प्राय: नेहरु की आलोचना करते हैं परंतु गांधीजी पर आक्रमण नहीं करते, क्योकि गांधी जी की छवि एक महान संत की है और उन पर आक्रमण से हिन्दुत्व नारेबाजी को क्षति पहुंच सकती है। नेहरू की छवि एक विद्वान व्यक्ति की है और विद्वता पर आक्रमण करना हमने लोकप्रिय बना दिया है।