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hemantrathore
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सुप्रीम कोर्ट के मुख्य न्यायाधीश जगदीश सिंह खेहर के इस कथन से एक सीमा तक ही सहमत हुआ जा सकता है कि राजनीतिक दल अपने चुनावी घोषणा पत्र के वादे पूरे नहीं करते और वे महज कागजी टुकड़ा बनकर रह जाते हैं, क्योंकि कई दल सत्ता में आने के बाद उन्हें पूरा करने में सफलता भी मिलती है और सत्ता में आने के बाद उन्हें पूरा करने की कोशिश में भी लगे रहते हैं, कई बार उन्हें अपने चुनावी वादों को पूरा करने में सफलता भी मिल जाती है और वह इस बात का प्रचार भी करते हैं। इस सबके बावजूद उनका कहना बिल्कुल सही है कि राजनीतिक दलों को अपने चुनावी घोषणा पत्रों की प्रति जवाबदेही बनाने की आवश्यकता है। क्योंकि इधर यह देखने में आ रहा है कि चुनाव जीतने के लिए कुछ राजनीतिक दलों के घोषणा पत्रों में मुफ्तखोरी की संसकृति को बढ़ावा देने वाले एेसे लोक-लुभावन वादे भी करते हैं और कर देते हैं। जिन्हें पूरा किया जाना संभव ही नहीं होता है। एक समय था जब बिजली, पानी आदि मुफ्त देने के वादे किए जाते थे, लेकिन अब टीवी और घी तक देने के वादे के किए जाने लगते हैं। ऐसे वादे करते समय राजनीतिक दलों इस बात का हिसाब मुश्किल से ही लगते हैं कि मुफ्त में चीजें अथवा सुविधाएं प्रदान करने के लिए जरूरी धन कहां से आया? अब तो रेवडि़यां बांटने के वादे के साथ सत्ता में आने वाले दल अपने घोषणा पत्र पर अमल के लिए केंद्र सरकार से अतिरिक्त सहायता देने की मांग भी करने लगे हैं यह स्पष्ट ही है कि केंद्र सरकार के लिए ऐसा करना संभव नहीं होता, लेकिन यदि वह अतिरिक्त सहायता देने से इन्कार करती है तो एस पर यह तोहमत मढ़ी जाने लगती है कि उसके द्वारा राज्य विशेष की अनदेखी की जा रही है।