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AvdheshKumar6242
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जेएनयू में छात्राओं के साथ एक प्रोफेसर द्वारा यौन दुर्व्यवहार के खिलाफ छात्रों के उग्र प्रदर्शन और प्रोफेसर की गिरफ्तारी का मामला अभी थमा भी नहीं है, इसी बीच दिल्ली के एक नामी स्कूल की छात्रा से शिक्षक द्वारा छेडछाड़ के बाद विरोध करने पर फेल करने का मामला सामने आया। इस पर क्षुब्ध छात्रा द्वारा आत्महत्या करने की खबर ने हर संवेदनशील व्यक्ति को विचलित किया। घटना के बाद अभिभावकों ने दिल्ली-नोयडा हाईवे पर जाम लगाकर विरोध प्रकट किया। इस मामले में स्कूल के प्रधानाचार्य व दो शिक्षकों के विरुद्ध प्राथमिकी दर्ज की गई है। विडंबना है कि जिस समाज में छात्र के मन में दुविधा थी कि गुरु-गोविंद सामने हों तो किसके पांव पडूं, उसमें हालात कहां पहुंच गये हैं। सही मायनो में गुरु को दूसरे भगवान का दर्जा दिया गया है। जेएनयू में जीव विज्ञान के प्रोफेसर पर आठ छात्राओं ने जो आरोप लगाये हैं, वे यौन उत्पीड़न की श्रेणी में आते हैं। बावजूद इसके विश्वविद्यालय प्रशासन ने आरोपी के खिलाफ कोई कार्रवाई नहीं की। छात्रों के उग्र प्रदर्शन के बाद पुलिस ने प्रोफेसर को गिरफ्तार तो किया मगर उसे उसी दिन जमानत मिल गई। छात्रों का एक समूह विश्वविद्यालय प्रशासन पर आरोपी प्रोफेसर को बचाने का आरोप लगाता रहा है। वे उसके निलंबन की मांग पर डटे हुए हैं।
दरअसल, दिल्ली में सत्ता परिवर्तन के बाद जेएनयू वाम व दक्षिणपंथी विचारधाराओं के संघर्ष का अखाड़ा बन गया है। प्रोफेसर ने भी आरोप लगाया है कि राजनीतिक कारणों से उन्हें लक्षित किया जा रहा है। जेएनयू जैसे प्रतिष्ठित संस्थान में ऐसी घटनाएं विचलित करने वाली हैैं क्योंकि यह परिसर महिला अधिकारों व जागरूकता के मामले में संवेदनशील रहा है। चिंता की बात है कि विश्वविद्यालय में किन कारणों से सशक्त माने जाने वाली लैंगिक संवेदनशीलता समिति जैसी संस्था को भंग किया गया। जेएनयू ही नहीं, देश के दूरदराज के विश्वविद्यालयों व कालेजों में ऐसी घटनाएं सामने आती हैं जो हमारे समाज में मूल्यों में गिरावट की ओर इशारा करती हैं। नि:संदेह शिक्षक की जिम्मेदारी पढ़ाई-लिखाई ही नहीं है, बल्कि जीवन व समाज से जुड़े तमाम सवालों का समाधान भी वह देता रहा है। यह रिश्ता एक विश्वास पर आधारित रहा है। ऐसे में यदि वह छात्राओं के आदर-सम्मान का नाजायज फायदा उठाकर अपनी गरिमा से गिरे तो यह शैक्षिक समाज के लिये चिंता का विषय होना चाहिए। यदि शैक्षणिक संस्थाओं में स्त्री की गरिमा का सम्मान नहीं हो पायेगा तो फिर समाज में कहां वह सुरक्षित रह पायेगी। ये घटनाक्रम समाज में दरकती वर्जनाओं व संवेदनहीनता की ओर इशारा करता है।